मनुष्य के समाज में “कुलीन” शब्द का बड़ा मान है। लोग प्रायः कुलीनता का संबंध ऊँचे कुल, धन-संपत्ति और बाहरी प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं। जिसके घर के द्वार पर हाथी झूमते हों, जिसके नाम के आगे अनेक उपाधियाँ लगी हों, उसे लोग सहज ही कुलीन मान बैठते हैं। परंतु यह कुलीनता का बाहरी और अधूरा रूप है। वस्तुतः कुलीनता मनुष्य के भीतर निवास करती है। उसका संबंध रक्त से कम और संस्कार से अधिक होता है। जिस मनुष्य के व्यवहार में विनय, वाणी में मधुरता और हृदय में करुणा हो, वही सच्चा कुलीन है।
हमारे समाज में ऐसे अनेक व्यक्ति हुए हैं जिनका जन्म साधारण परिवारों में हुआ, पर अपने आचरण से वे महान बन गए। दूसरी ओर, अनेक लोग उच्च कुल में जन्म लेकर भी अपने दुष्कर्मों से समाज की दृष्टि में तुच्छ हो गए। कुलीनता वह दीपक है जो मनुष्य के चरित्र को आलोकित करता है। यदि किसी व्यक्ति का मन छल, घमंड और कठोरता से भरा हो, तो उसका ऊँचा वंश भी उसे सम्मान नहीं दिला सकता। जिस प्रकार सुगंध के बिना फूल केवल रंग का प्रदर्शन रह जाता है, उसी प्रकार सद्गुणों के बिना कुलीनता केवल दिखावा बन जाती है।

मनुष्य की सच्ची कुलीनता उसके व्यवहार में दिखाई देती है, न कि उसके वस्त्रों या धन-संपत्ति में। मुझे अपने विद्यालय के दिनों की एक घटना स्मरण आती है। बरसात का समय था, मुझे विद्यालय पहुँचने में देर हो रही थी , इसलिए मैं तेज गति से आगे बढ़ रही थी । साथ में कई छात्र-छात्राएँ भी चल रहे थे। सड़क फिसलन भरी थी । अचानक मेरा पैर फिसल गया और स्कूल पहुँचने से कुछ पहले ही मै कीचड़ में गिर गई। एक तो कीचड़ में गिरना और वह भी सबके सामने ।आस-पास चल रहे सभी छात्र -छात्राएँ हँसने लगे। आत्मग्लानि और अपमान से मैं गड़ गई।
हमारे विद्यालय में एक सीनियर छात्र था जो अत्यंत साधारण परिवार से था। अक्सर लोग उसके गरीबी की चर्चा करते थे। वह मेरे पास आया और मुझे उठाया। उसने दूसरे छात्रों को हँसने के लिए डाँटा और अपने पानी की बोतल से मुझे हाथ-पैर साफ़ करने में मदद की। जबकि अन्य छात्र इसे उपहास करने का अवसर समझ रहे थे।
उस दिन मैंने अनुभव किया कि कुलीनता ऊँचे घरों की देन नहीं, बल्कि बड़े हृदय की पहचान है। दूसरी ओर, कुछ संपन्न परिवारों के छात्र दूसरों का उपहास उड़ाते थे और अपने धन का घमंड करते थे। उनके व्यवहार में कठोरता होती है।,जबकि सच्चा कुलीन वही है जिसके भीतर दया, विनम्रता और सहानुभूति हो।
आज समाज में कुलीनता का अर्थ बदलता जा रहा है। लोग धन को ही सम्मान का आधार मानने लगे हैं। परंतु धन से मनुष्य बड़ा नहीं होता, उसके विचार उसे बड़ा बनाते हैं। सच्ची कुलीनता वही है जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे, जो अपनी शक्ति का उपयोग परोपकार में करे और जो विनम्रता को अपने जीवन का आभूषण बनाए। ऐसे मनुष्य समाज को ऊँचा उठाते हैं और मानवता को गौरव प्रदान करते हैं। अतः कुलीनता जन्म का नहीं, चरित्र का विषय है।



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