कशमकश// KASHMAKASH: STORY
बारात विदा हो चुकी थी। आँगन में बिखरे फूल, सुबह के मद्धम प्रकाश में टिमटिमाते बल्बों की लड़ी जैसे पूरी ताकत से अपने अस्तित्व को किसी तरह बनाए रखना चाहती हो। खाली पड़ी कुर्सियाँ जैसे किसी उत्सव के समाप्त होने का संकेत कर रही थीं। घर पर आए मेहमान एक एक कर विदा हो गए। सभी को अपने घर जाने की शीघ्रता थी, भला दुल्हन की विदाई के बाद किसे सुनसान घर अच्छा लगता है। लेकिन घर के द्वार पर खड़े मोहनलाल की आँखें उस सड़क पर टिकी थीं, जहाँ कुछ देर पहले तक उनकी बेटी विवाह के बाद विदा होकर चली गई थी। अब वहाँ केवल धूल उड़ रही थी और रह गए थे कार के टायरों के निशान, जो मोहनलाल जी को रह-रह कर बेटी की याद दिला रहे थे।
आह! कैसा होता है एक बेटी का बाप होना । मानो एक माली अपने द्वारा पोषित लता को उखाड़ कर दूसरे आँगन में दे देना। मोहनलाल ने एक लंबी साँस ली और धीरे-धीरे भीतर आ गए। कमरे में रमा की हँसी जैसे अभी भी गूँज रही थी—वही चंचल आवाज, जो सुबह होते ही पूरे घर को जगा देती थी। मोहनलाल जी के आँखों के आगे रमा के शैशव से लेकर युवा होने तक के सारे दृश्य एक -एक कर गुजरने लगे । मानो अभी तो वह परदे के पीछे छिपकर उन्हें पुकार रही हो ;”पप्पा, मुझे ढूँढों!” मोहनलाल जी के आँखों से आँसू झरने की तरह गिरने लगे।
कला देवी भी कोने में बैठी आँचल से आँसू पोंछ रही थीं।
“रोओ मत कला,” मोहनलाल ने भारी स्वर में कहा, “बेटी तो पराया धन होती है।”
पर यह कहते समय उनका अपना गला भर्रा गया। उन्हें लगा जैसे उन्होंने अपने ही हृदय को समझाने के लिए यह बात कही हो।
रमा उनकी इकलौती संतान थी। कितने लाड़-प्यार से पाला था उसे! जब वह छोटी थी तो मोहनलाल रोज़ बाजार से उसके लिए गुड़िया लाते। वह उनकी उँगली पकड़कर पूरे गाँव में घूमती और गर्व से कहती—“ये मेरे बाबूजी हैं।”
आज वही उँगली छूट गई थी।
मोहनलाल चारपाई पर बैठ गए। आँखों के सामने विदाई का दृश्य घूमने लगा। रमा फूट-फूटकर रो रही थी—“पप्पा , अब आप समय पर खाना खा लिया करिएगा। मम्मा का ध्यान भी आपको ही रखना है। ”
उस समय मोहनलाल का कलेजा जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया था। उन्होंने काँपते हाथों से बेटी के सिर पर हाथ रखा था, पर शब्द गले में अटक गए थे।

उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि बेटी की विदाई केवल एक रस्म नहीं, पिता के जीवन का सबसे कठिन क्षण होती है। जिस आँगन में उसकी किलकारियाँ गूँजी हों, उसे किसी अंजान घर भेज देना कितना बड़ा साहस है! मन बार-बार पूछता—क्या वहाँ उसे उतना ही स्नेह मिलेगा? क्या कोई उसकी छोटी-छोटी बातों को समझेगा? कोई उसकी जिद पूरी करेगा या उसके नखरे उठाएगा? उसके रूठने पर उसे मनाकर खाना खिला देगा? सैंकड़ों प्रश्न-चिह्न उनके मस्तिष्क में एक साथ आ खड़े हुए! आशंकित से वे कलादेवी की ओर देखने लगे।
कला देवी बोलीं, “लड़का अच्छा है, परिवार भी भला है। हमारी रमा सुखी रहेगी।”
मोहनलाल ने सिर हिलाया; “हाँ यही सोचकर मन को थोड़ी शांति मिल रही है। उम्मीद है सब भला होगा। “
“रमा समझदार लड़की है, वह जल्दी ही सबसे घुल-मिल जाएगी और सबको अपना बना लेगी” कलादेवी ने कहा । मोहनलाल ने भी सहमति में सिर हिलाया, मानो वे दोनों खुद को सांत्वना दे रहे हों।
उन्होंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर विवाह किया था। बरसों की जमा-पूँजी खर्च हो गई, पर उन्हें इसका कोई दुख न था। पिता का सबसे बड़ा धर्म बेटी को सम्मानपूर्वक विदा करना ही तो है।
फिर भी भीतर एक अजीब कशमकश थी— एक ओर कर्तव्य पूरा करने का संतोष और दूसरी तरफ़ बेटी के बिछोह का अथाह दुख।
बाहर सूरज अपना तेज प्रकाश फ़ैला रहा था जो रमा के वैवाहिक जीवन का प्रथम दिन था, लेकिन मोहनलाल जी के हृदय में आशंकाओं की रात गहरा रही थी। वे उठकर रमा के कमरे में गए। मेज पर उसकी पुरानी किताबें रखी थीं, दीवार पर बचपन की तस्वीरें टँगी थी। उन्होंने तस्वीर को देर तक देखा और मुस्करा दिए।
“मेरी बिटिया अब अपने घर की रानी बनेगी,” उन्होंने मन ही मन कहा।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार उन आँसुओं में केवल विछोह का दुख नहीं था- उसमें एक पिता की प्रार्थना, आशा और अपनी संतान के सुखी भविष्य का उजला स्वप्न भी घुला हुआ था। कलादेवी ने पीछे से आकर उनके कंधे में सिर टिका दिया। दोनों के भीतर संतोष की लहर बहने लगी।
लेखिका -कुसुमलता जोशी © all rights reserved to the writer.



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