अकल बड़ी कि भैंस (लघु कथा)
राम सिंह एक पहलवान था । वह रोज अखाड़े जाता और कुश्ती का अभ्यास करता । धीरे-धीरे राम सिंह बहुत मजबूत और ताकतवर हो गया। उसने बहुत सी प्रतियोगिताओं में भाग लिया और कई दूसरे पहलवानों को अपनी ताकत से हरा दिया। उसे अपनी शक्ति पर बहुत घमंड हो गया था। जब वह रास्ते में चलता तो बहुत अकड़ कर चलता। कहीं जाते वक्त वह बीच-बीच में हुँकार सी भरता। लोग उसकी तरफ़ देखते तो उसका हट्टा-कट्टा शरीर देखकर डर जाते और रास्ता खाली कर देते। यह देख कर राम सिंह को बड़ा ही मज़ा आता।

अपना दबदबा बनाए रखने के लिए कई बार राम सिंह अकारण ही लोगों से मार-पीट भी करता। जब ये सब बातें राम सिंह की माँ को पता चलती तो उन्हें बिलकुल अच्छा न लगता था। उस की माँ अकसर उसे समझाती ,” बेटा ! अनावश्यक घमंड नहीं करना चाहिए।” राम सिंह को माँ की सलाह समझ न आती। वह कहता -“माँ ! जब मैं इस लायक शक्तिशाली हूँ कि लोग मुझ से डरें, तो इसमें अनावश्यक घमंड की बात कहाँ से आई?” माँ राम सिंह को तरह-तरह से समझाती ,पर राम सिंह के आगे सारे तर्क बेकार थे।
राम सिंह के गाँव में एक और युवक नयन सिंह रहता था। वह बहुत विद्वान था। किंतु शरीर से बहुत ही मरियल था। नयन सिंह कृषि वैज्ञानिक था और लोगों को नई तकनीक से खेती करना सिखाता था। इसी वजह से किसानों को खेती में बहुत लाभ होता। वे नयन सिंह का दिल से सम्मान करते । जैसे ही कहीं नयन सिंह आ जाता लोग उठ कर खड़े हो जाते और उसका दिल खोलकर आदर सत्कार करते। जबकि राम सिंह के आने पर लोग रास्ता खाली कर निकल जाने में ही भलाई समझते। राम सिंह को नयन सिंह का इस प्रकार का आदर देख जलन होती। वह मौका पाते ही नयन सिंह के कमजोर शरीर का मज़ाक उड़ाता।राम सिंह की इस हरकत से नयन सिंह को बहुत बुरा लगता था किंतु वह सिर्फ़ मुसकुरा कर बात टाल देता।

एक दिन गायों को नदी पार कराते हुए एक ग्वाला लड़का दलदल में गिर गया। लड़का जितना भी बाहर निकलने की कोशिश करता , और अंदर की ओर धँस जाता। सब लोग उस लड़के को बचाने के लिए शोर मचाने लगे । किंतु किसी की हिम्मत उसे बाहर निकालने की नहीं थी। शोर सुनकर राम सिंह और नयन सिंह दोनों वहाँ पहुँच गए। राम सिंह बिना सोचे समझे दलदल में कूद गया। किंतु अब वह भी दलदल में फ़ँस गया। उसका शरीर बहुत भारी और विशाल था। वह तेज़ी से दलदल में भीतर की ओर जाने लगा। अब तक तो एक बच्चा दल दल में था, जिसे किसी भी तरह बचा लेते । अब राम सिंह भी दल-दल में फँस गया था उसे वहाँ से बाहर निकालना बहुत मुश्किल था। उन दोनों को इस प्रकार डूबता हुआ देख कर सब लोग हाय-हाय की पुकार करने लगे। राम सिंह ने मूर्खतावश खुद की जिंदगी भी खतरे में डाल दी थी।
नयन सिंह यह सब देख रहा था। उसने मन में विचार किया । उसने राम सिंह और बच्चे दोनों को थोड़ी देर शाँत खड़े होने को कहा। एक बहुत बड़ी मज़बूत रस्सी गाँव से मँगाई। रस्सी को दूर एक पेड़ से बाँध दिया। अब रस्सी को राम सिंह और बच्चे तक पँहुचाया। दोनों के रस्सी पकड़ लेने पर नयन सिंह ने उन्हें धीरे-धीरे बाहर खींच लिया। सब लोग नयन सिंह की बुद्धिमानी की तारीफ़ करते हुए कहने लगे कि हट्टे-कट्टे राम सिंह ने तो अपने ताकत के नशे खुद की जिंदगी भी खतरे में डाल दी थी। भला हो कि नयन सिंह ने उसकी जान बचा ली। आज पता ही चल गया कि अक्ल बड़ी कि भैंस।
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Author : © Kusum Lata Joshi



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