तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

  1. लेखक परिचय:
  2. मौखिक प्रश्नों के उत्तर:
  3. लिखित प्रश्नों के उत्तर :
    1. (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
    2. (ख) निम्नलिखित प्रश्‍नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) दीजिए-
    3. (ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-
  4. भाषा अध्ययन :
    1. 3.पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए-
    2. 4. निम्नलिखित शब्दों के हिन्दी पर्याय दीजिए-
    3. 5. निम्नलिखित का संधिविच्छेद कीजिए:
    4. 6. निम्नलिखित का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए:

प्रह्लाद अग्रवाल- जन्म 1947, जबलपुर, मध्य प्रदेश  शिक्षा:  एम.ए.हिंदी व्यवसाय : प्राध्यापक, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना, फ़िल्मों और फ़िल्मी इतिहास पर लेखन और आलोचना।

मुख्य कृतियाँ – सातवाँ दशक , तानाशाह, मैं खुशबू, सुपर स्टार, राजकपूर: आधी हकीकत आधा फ़साना, कवि शैलेंद्र : जिंदगी की जीत मैं यकीन , प्यासा: चिर अतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग: सुभाष घई की फ़िल्मकला, ओ रे माँझी: बिमल राय का सिनेमाऔर महाबाज़ार के महानायक : इक्कीसवीं सदी का सिनेमा।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक -दो पंक्तियों में दीजिए-

1.’तीसरी कसम’ फ़िल्म को कौन -कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?

उत्तर – तीसरी कसम फ़िल्म को राष्ट्रपति स्वर्णपदक मिला , बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट असोसिएशन द्वाअरा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के रूप में सम्मानित हुई। एवं कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित हुई। मास्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी यह फ़िल्म पुरस्कृत और प्रशंसित हुई।

 2. शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाई हैं?

उत्तर : शैलेंद्र ने एक ही फ़िल्म ’तीसरी कसम’ बनाई है।

3. राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।

उत्तर : राजकपूर ने संगम,  मेरा नाम जोकर,अजन्ता,मैं और मेरा दोस्त,राम तेरी गंगा मैली बॉबी, श्री 420, सत्यम् शिवम् सुन्दरम्  इत्यादि फ़िल्में निर्देशित की।

4.”तीसरी कसम’ फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?

उत्तर : तीसरी कसम फ़िल्म के नायक का नाम राजकपूर है और नायिका का नाम वहीदा रहमान है। फ़िल्म में राजकपूर ने हीरामन गाड़ीवान का अभिनय किया है, जबकि वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत पात्र का नाम हीराबाई है जो नौटंकी की बाई है।

5. फ़िल्म”तीसरी कसम’  का निर्माण किसने किया?

उत्तर: फ़िल्म”तीसरी कसम’  का निर्माण गीतकार शैलेंद्र ने किया।

6. राजकपूर ने “ मेरा नाम जोकर” के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?

उत्तर : राजकपूर ने “मेरा नाम जोकर” के निर्माण के समय इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इस फ़िल्म का एक ही भाग बनाने में छह वर्षों का समय लग जाएगा।

7. राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?

उत्तर: जब शैलेंद्र अपने मित्र राजकपूर  को फ़िल्म ’तीसरी कसम’ की पटकथा सुनाने गए तो राजकपूर ने कहानी सुनकर बड़े उत्साहित होते हुए फ़िल्म में काम करना स्वीकार कर लिया। पर तुरंत  गंभीर होते हुए अपना पूरा पारिश्रमिक माँगा। शैलेंद्र को अपने दोस्त से ऐसी उम्मीद न थी  अतः उनका चेहरा मुरझा गया।

8.फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?

उत्तर: फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे ।

लिखित प्रश्नों के उत्तर :

प्रश्न 1 – ‘तीसरी कसम’ फिल्म को सेल्यूलाइट पर लिखी कविता क्यों कहा है ?
उत्तर –  सेल्यूलाइट का अर्थ होता है फ़िल्म का पर्दा। किसी  कहानी को कैमरे की सहायता से फिल्मी परदे पर उतारना ही सेल्युलाइड पर उतारना है। किसी कविता की खासियत उसका भाव पक्ष होता है विचार युक्त गद्य के विपरीत कविता भावनाओं और संवेदनाओं से भरपूर होती है । शैलेंद्र ने भी ” तीसरी कसम” फिल्म को अपनी भाव प्रवणता का सर्वश्रेष्ठ तथ्य प्रदान किया। तीसरी कसम फिल्म में कहानी का रेशा रेशा, उसकी छोटी से छोटी बारीकियां पूरी तरह से उतर आईं है। साहित्य की इस मार्मिक कृति को शैलेंद्र परदे पर पूरी तरह से उतारने में सफल हो सके । इसीलिए तीसरी कसम फिल्म “सैल्यु लाइड पर लिखी गई कविता” कहा गया है।

 । प्रश्न 2 – ‘तीसरी कसम’ फिल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे ?
उत्तर –यदयपि फिल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे प्रसिद्ध सितारे थे और शंकर जयकिशन का संगीत था  जिनकी लोकप्रियता उस समय सातवें आसमान पर थी लेकिन फिर भी फिल्म को खरीददार नहीं मिल रहे थे। इसका कारण यह था कि ‘तीसरी कसम’ फिल्म की कहानी में जो भावनाएँ थी उनको समझना किसी मुनाफा कमाने वालों के लिए आसान नहीं था।  फिल्म में प्रदर्शित  करुणा  और संवेदनाओं को किसी तराज़ू में नहीं तौला जा सकता था इसीलिए जब ‘तीसरी कसम’ रिलीज हुई तो उसका कोई खास प्रचार नहीं हो पाया। और फ़िल्म को खरीदने वाले नही मिल रहे थे।

प्रश्न 3 – शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है ?
उत्तर -शैलेंद्र के अनुसार दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर किसी भी फिल्म निर्माता को कोई भी बिना मतलब की चीज़ दर्शकों को नहीं दिखानी चाहिए। उनका दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। उनका मानना था कि एक कलाकार का यह कर्तव्य है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।

प्रश्न 4 – फिल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफ़ाई क्यों कर दिया जाता है ?
उत्तर – फिल्मों में अगर फिल्मों में कहीं त्रासद अर्थात दुखद स्थितियों का वर्णन किया जाता है तो उसको बहुत अधिक बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। दुःख को इतना अधिक भयानक रूप से प्रस्तुत किया जाता है कि वो लोगो को भावनात्मक रूप से कमजोर कर सके और लोग ज्यादा-से-ज्यादा फिल्मों की ओर आकर्षित हो सकें।

प्रश्न 5 – ‘शैलेंद ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’ – इस कथन से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – राजकपूर को एशिया के सबसे बड़े शो मैन का ख़िताब हासिल था। वे अपनी आँखों से अभिनय करने और अपनी आँखों से ही भावनाओं को दिखने में माहिर थे। इसके विपरीत शैलेंद्र एक उम्‍दा गीतकार थे जो भावनाओं को कविता का रूप देने में माहिर थे। शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को अपनी कविता और फिल्म की कहानी में शब्द रूप दिए और राजकपूर ने भी उनको बड़ी ही खूबी से निभाया।

प्रश्न 6 – लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – शोमैन का अर्थ उस अभिनेता से होता है जो किसी भी पात्र का अभिनय इस नाटकीय रूप से करे कि लोगों का मनोरंजन हो और वह अपने अभिनय से लोगो को आकर्षित भी कर सके तथा  अंत तक लोगों को अपने अभिनय के साथ जोड़े रखे। ये सारी खूबियाँ राजकपूर में कूट-कूट कर भरी थी वे आंखों से बात करतने वाले कलाकार माने जाते थे। संगम, मेरा नाम जोकर, अजंता, सत्यम् शिवम् सुंदरम् जैसी सफल फिल्मों में अभिनय करने के बाद राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है।

प्रश्न 7 – ‘श्री 420’ के गीत – ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की ?
उत्तर – ‘श्री 420’ के गीत – ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति की क्योंकि उनका मानना था कि दर्शकों को चार दिशायें तो समझ आ सकती है परन्तु दर्शक को दसों दिशाओं को समझने में परेशानी हो सकते हैं क्योंकि सामान्यतः दिशायें चार ही कही जाती हैं ।

प्रश्न 1 –राजकपूर द्वारा फिल्म की असफलता के खतरों के आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फिल्म क्यों बनाई ?
उत्तर –  ‘तीसरी कसम’ फिल्म शैलेंद्र की पहली फिल्म है । राजकपूर शैलेंद्र के घनिष्ठतम मित्रों में से थे और उन्होने खुद फिल्में भी बनाई थी और फिल्म निर्माण में असफलताओं के खतरों से वाकिफ भी थे। स्वयं राजकपूर को अपनी फिल्म “मेरा नाम जोकर” के एक भाग बनाने में छह साल लग गए थे। अत: फिल्म निर्माण आसान काम नहीं था।  शैलेंद्र एक भावुक कवि हृदय व्यक्तित्व थे जबकि फिल्म निर्माता को व्यावसायिक सूझ बूझ वाला होना चाहिए। इसलिए राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र के नाते शैलेंद्र को फिल्म की असफलता के खतरों से भी परिचित करवाया।

प्रश्न 2 – ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘तीसरी कसम’ फिल्म राजकपूर के फ़िल्मी जीवन में अभिनय का वह पड़ाव था, जब राजकपूर को एशिया के सबसे बड़े शोमैन का स्थान मिल चुका था। राजकपूर का अपना खुद का व्यक्तित्व ही किंवदंती बन चुका था, लोग उनकी मिसाल देने लगे थे। लेकिन ‘तीसरी कसम’ फिल्म में राजकपूर ने अपने उस महान व्यक्तित्व को पूरी तरह से हीरामन बना दिया था। पूरी फिल्म में राजकपूर कहीं पर भी हीरामन का अभिनय करते हुए नहीं दिखे, बल्कि वे तो खुद ही हीरामन बन गए थे। ऐसा हीरामन जो हीराबाई की फेनू-गिलासी बोली पर रीझता और उसकी ‘मनुआ-नटुआ’ जैसी भोली सूरत पर न्यौछावर होता हुआ और हीराबाई के थोड़े से भी गुस्सा हो जाने पर आपने आप को ही दोषी ठहरता हुआ सच्चा हीरामन बन जाता है। तीसरी कसम फिल्म में राजकपूर मासूमियत के चरमोत्कर्ष को छूते हैं । वे वहां अभिनय नहीं करते बल्कि अपने आप को कहानी के पात्र हीरामन में ही तब्दील कर पाने में सफल होते हैं।

प्रश्न 3-लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि तीसरी कसम ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है ?
उत्तर – ‘तीसरी कसम’ फिल्म फणीश्वरनाथ रेणु की पुस्तक “मारे गए गुलफाम” पर आधारित है। शैलेंद्र ने इस साहित्य के सभी पात्रों, भावनाओं, घटनाओं को हु-ब-हु दर्शाया है। कहानी का एक छोटे-से-छोटा भाग, उसकी छोटी-से-छोटी बारीकियाँ फिल्म में पूरी तरह से दिखाई गई है। शैलेंद्र ने मूल कथा को यथा रूप में प्रस्तुत किया था। शैलेन्द्र कहानी के भावनात्मक पक्ष को सैल्युलाइड पर उतार पाने में कामयाब हुए हैं।इन सभी कारणों की वजह से लेखक ने लिखा है कि तीसरी कसम ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है।

प्रश्न 4 – शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं। अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – शैलेंद्र ने जो भी गीत लिखे, वे सभी बहुत पसंद किये जाते रहे है। शैलेंद्र ने कभी भी झूठे रंग-ढ़ंग या दिखावे को नहीं अपनाया। वे अपने गीतों में भावनाओं को अधिक महत्त्व देने वाले थे, न कि अपने गीतों को कठिन बनाने वाले। ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पे लाल टोपी रुसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ -यह गीत शैलेंद्र ही लिख सकते थे, क्योंकि इसमें सच्ची भावना झलक रही है। उनके गीत नदी की तरह शांत तो लगते थे परन्तु उनका अर्थ समुद्र की तरह गहरा होता था। उनका मानना था कि एक कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह दर्शकों की पसंद को परिष्कृत करने की कोशिश भी करे।

प्रश्न 5 – फिल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए ?
उत्तर – ‘तीसरी कसम’ फिल्म शैलेंद्र की पहली और आखरी फिल्म थी। शैलेन्द्र एक भावुक आदर्शवादी कवि थे उन्हें न तो अधिक धन-सम्पति का लालच था, न ही नाम कमाने की इच्छा। उन्हें तो केवल आत्म तुष्टि की कामना थी। तीसरी कसम फिल्म निर्माण के द्वारा वे कहानी में छिपे सुन्दर भावनात्मक पक्ष को प्रस्तुत करना चाहते थे।

प्रश्न 6 – शैलेन्द्र के निजी जीवन की छाप उनकी फिल्म में झलकती है-कैसे ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – शैलेंद्र एक आदर्शवादी संवेदनशील और भावुक कवि थे। शैलेंद्र ने अपने जीवन में एक ही फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम ‘तीसरी कसम’ था। यह एक संवेदनात्मक और भावनापूर्ण फिल्म थी। शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराई उनके निजी जीवन की विशेषता थी और यही विशेषता उनकी फिल्म में भी दिखाई देती है। ‘तीसरी कसम’ का नायक हीरामन अत्यंत सरल हृदयी और भोला-भाला नवयुवक है, जो केवल दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं। उसके लिए मोहब्बत के सिवा किसी चीज़ का कोई अर्थ नहीं। ऐसा ही व्यक्तित्व शैलेंद्र का था, हीरामन को धन की चकाचौंध से दूर रहनेवाले एक देहाती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसी प्रकार लगभग बीस वर्षों तक फिल्म इंडस्ट्री में काम कर के भी शैलेंद्र स्वयं  यश और धनलिप्सा से कोसों दूर थे। इसके साथ-साथ फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ में दुख को भी सहज स्थिति में जीवन सापेक्ष प्रस्तुत किया गया है। शैलेंद्र अपने जीवन में भी दुख को सहज रूप से जी लेते थे। वे दुख से घबराकर उससे दूर नहीं भागते थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है।

प्रश्न 7 – लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फिल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहा तक सहमत हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –लेखक के अनुसार ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था। लेखक का यह कथन बिलकुल सही है क्योंकि इस फिल्म की कलात्मकता काबिल के लायक है। शैलेन्द्र एक संवेदनशील तथा भाव-प्रवण कवि थे और उनकी संवेदनशीलता इस फ़िल्म में स्पष्ट रुप से मौजूद है। इस फिल्म न तो अनावश्यक रूप से दुःख को ग्लोरीफाई किया है और न भावनात्मक पक्ष पर व्यावसायिकरण हावी होने दिया गया। यह संवेदनशीलता किसी कवि हृदय में ही दिख सकती है न कि दो का चार करने वाले फ़िल्म निर्माता में ।

– ……वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार सम्पति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।

उत्तर – राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र के नाते शैलेंद्र को फिल्म की असफलता के खतरों से भी परिचित करवाया फिर शैलेन्द्र ने उनकी बात नहीं मानी क्योंकि शैलेन्द्र एक भावनात्मक कवि थे, फिल्म निर्माण का उनका उद्देश्य धनोपार्जन और नाम कमाना  न होकर कोमल भावनाओं का चित्रण और आत्म संतुष्टि ही था।

2 – उनका दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रूचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।

उत्तर – इस पंक्ति से लेखक का विचार पक्ष प्रस्तुत होता है जो दर्शकों को विचार वान और प्रबुद्ध नागरिक के रुप में देखना चाहते हैं जब संगीतकार जयकिशन ने गीत ‘प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल’ की एक पंक्ति ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ में दसों दिशाओं का प्रयोग करने में आपत्ति जताई तो शैलेन्द्र इस पंक्ति को बदलने के लिए तैयार नहीं हुए।  वे  दर्शकों की सोच को परिष्कृत करना अपना कर्तव्य समझते थे।

3 – व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संकेत देती है।

उत्तर – शैलेन्द्र के गीतों में सिर्फ दुःख-दर्द नहीं होता था, उन दुखों से निपटने या उनका सामना करने का इशारा भी होता था। और वो सारी क्रिया-प्रणाली भी मौजूद रहती थी जिसका सहारा ले कर कोई भी व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है। उनका मानना था कि दुःख कभी भी इंसान को हरा नहीं सकता बल्कि हमेशा आगे बढ़ने का इशारा देता है। वे अनावश्यक रूप मेसे दुःख को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने और दर्शकों के भावानात्मक शोषण पर विश्वास नहीं करते थे।

4 – दरअसल इस फिल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने का गणित जानने वाले की समझ से परे थी।

उत्तर – ‘तीसरी कसम’ फिल्म की कहानी में जो भावनाएँ थी उनको समझना किसी मुनाफा कमाने वालों के लिए आसान नहीं था। इस फिल्म में दिखाए गए करुणा की भावनाऐं किसी व्यावसायी बुद्धि वाले और फिल्म निर्माण कर मुनाफा कमाने की सोच रखने वाले की सोच से बाहर थीं।

5 – उनके गीत भाव-प्रणव थे-दुरूह नहीं।

उत्तर – शैलेंद ने जो भी गीत लिखे, वे सभी बहुत पसंद किये जाते रहे है। शैलेंद्र ने कभी भी झूठे रंग-ढ़ग या दिखावे को नहीं अपनाया। उन्होनेअपने गीतों में भावनाओं को अधिक महत्त्व दिया। वे गीतों को कठिन बना कर प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे। वे सामान्य जन मानस के लिए गीत लिखते थे।झूठे अभिजात्य को उन्होंने कभी नहीं अपनाया। इसीलिए ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पे लाल टोपी रुसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ -यह गीत शैलेंद्र ही लिख सकते थे, क्योंकि इसमें सच्ची भारतीयता की भावना झलक रही है। उनके गीत नदी की तरह शांत तो लगते थे परन्तु उनका अर्थ समुद्र की तरह गहरा होता था।

चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना

चेहरा मुरझाना- उदास होना – माँ की बीमारी की खबर सुनते ही कविता का चेहरा मुरझा गया।

चक्कर खा जाना- बेहोश होना- इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट के चौकीदार के घर एक करोड़ की नकदी पाकर सी०बी०आई० अधिकारी भी चक्कर खा गए।

 दो से चार बनाना- मुनाफ़ा कमाना- नए व्यवसाय से जुड़ते ही अमन हमेशा दो से चार बनाने के फ़िराक में रहता है।

आँखों से बोलना -आँखों से अभिनय करना- तीसरी कसम फ़िल्म में अभिनय करती वहीदा रहमान आँखों से बोलती प्रतीत होती हैं।

(क) शिद्दत (ख) याराना (ग) बमुश्किल (घ) खालिस (ङ) नावाकिफ़

(च) यकीन (छ) हावी (ज) रेशा

उत्तर:

(क) शिद्दत- गहराई से

(ख)  याराना-दोस्ती, मित्रता

(ग) बमुश्किल  – कठिन

(घ) खालिस – शुद्ध . खरा

(ङ) नावाकिफ़ – अनभिज्ञ , जानकारी रहित

(च) यकीन  – विश्वास, भरोसा

(छ) हावी – भारी पड़ना, प्रभावी होना

(ज) रेशा  –  तंतु, धागा

(क) चित्रांकन –  ____________+_______________

(ख) सर्वोत्कृष्ट – _____________+_______________

(ग) चर्मोत्कर्ष – _______________+_____________

(घ) रूपांतरण – ___________+______________

(ङ) घनानंद – _____________+_______________

उत्तर: (क) चित्रांकन = चित्र + अंकन 

(ख) सर्वोत्कृष्ट = सर्व + उत्कृष्ट

(ग) चर्मोत्कर्ष = चरम + उत्कर्ष

(घ) रूपांतरण = रूप + अंतरण

(ङ) घनानंद=घन+आनंद

(क) कला मर्मज्ञ __________

(ख) लोकप्रिय____________

(ग) राष्ट्रपति_____________

उत्तर: (क) कला-मर्मज्ञ – कला का मर्मज्ञ (तत्पुरूष समास)

(ख) लोकप्रिय –    लोक में प्रिय (तत्पुरूष समास)

(ग) राष्ट्रपति –       राष्ट्र का पति (तत्पुरुष समास)

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