भाई-बहिन के प्रेम का प्रतीक

रक्षा बंधन का पर्व यूँ तो भाई- बहिन के प्रेम का प्रतीक माना जाता है । यह हमारे देश के लोकप्रिय पर्वों में से एक है। यह परंपरागत रूप से पीढ़ियों से भाई-बहिन के आपसी लगाव और आत्मीयता का प्रदर्शित करने के पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है ।इस दिन बहिनें बहुत प्यार से अपने भाई की कलाई में राखी बांधती हैं और भाई प्रेम से बहिन को उपहार देते हैं । किंतु सनातन धर्म में रक्षा बंधन का स्वरूप सिर्फ़ इतने तक ही सीमित नहीं है ।

पौरणिक कथा

सबसे पहली राखी अथवा रक्षा किसने किसे बाँधी थी इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता । पूर्व में भी यह पर्व भाई बहिन के पर्व के रूप में मनाने के कोई व्यापक प्रमाण नही मिलते। एक पौराणिक कथा के अनुसार , एक बार जब देवराज इंद्र राक्षसों से युद्ध करने जा रहे थे तो इंद्र पत्‍नी शची ने उनकी रक्षा के लिए रक्षा -सूत्र बाँधा था ।

एक अन्यत्र कथा में , जब भगवान विष्णु ने महाबलि को पाताल का राजा बना कर स्वयं उनका द्‍वारपाल बनना स्वीकार कर लिया था । इसके बाद वे पाताल में ही निवास करने लगे । तब सावन की पूर्णिमा के दिन , देवी लक्ष्मी ने महाबली के हाथ में राखी बाँध कर उन्हें अपना भाई बना लिया था । इसके बाद महाबलि ने उन्हें उपहार स्वरूप उनके पति भगवान विष्णु प्रदान किए थे ।

रक्षाबंधन मनाने का कारण

पूर्व काल से ही भारत में पुरोहित द्‍वारा यजमान के हाथ में रक्षा सूत्र बाँधने की परंपरा चली आ रही है । जब भी कोई यज्ञ या धार्मिक कार्य शुरू किया जाता है, पुरोहित या ब्राह्‍मण कार्य शुरू करने से पूर्व ही यजमान के हाथ में रक्षा -सूत्र बाँधते हैं जिससे यजमान और उनका परिवार सुरक्षित रहे और कार्य निर्विघ्‍न संपन्‍न हो जाए । अन्य कई अवसरों , त्यो‍हारों और संक्रांति आदि पर भी ब्राह्‍मण रक्षा सूत्र बाँधते हैं ।

रक्षा या रक्षासूत्र का ही नाम कालांतर में अपभ्रंश होकर राखी हो गया । मुख्यत: यह जिसके हाथ में बाँधी जाती है उस व्य‍क्ति के जीवन रक्षा की कामना से ही बाँधी जाती है ।

रक्षा बाँधने का मंत्र

येन बद्‍धो बलिर्राजा दानवेंद्रो महाबलः।

तेन त्वामनुबध्‍नामि रक्षे मा चल मा चल॥

मध्यकाल में मुगलों और विदेशी आक्रांताओं के लगातार आक्रमण होते रहने से बड़ी संख्या में सनातनी वीर योद्‍धा मारे गए । तब उनके जीवन की रक्षा के लिए और अपने भाइयों की दीर्घायु की कामना से बहिनों ने अपने भाइयों के कलाई में राखी बाँधना शुरू किया । भाइयों ने भी अपनी बहिन को रक्षा का वचन दिया।यहीं से यह पर्व भाई बहिन के पर्व के रूप में उभर कर सामने आया ।

कुछ लोग यह कहते हैं कि बहिन राखी बाँधती है ,तब भाई उसकी रक्षा का वचन देता है । यह बात बिलकुल गलत है । सनातन धर्म मेंं हर स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है । उन्हें माँ- बहिन आदि का संबोधन दिया जाता है । कोई भी स्त्री हो , उसके शील की रक्षा करना हर सनातनी पुरुष का कर्तव्य होता है ।इसीलिए बहिन की रक्षा करना तो भाई का धर्म ही है।रक्षा बाँधने का मुख्य उद्देश्य भाई के लिए दीर्घायु की कामना करना है।

रक्षाबंधन के दिन का महत्त्‍व :

रक्षा- बंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । रक्षा- बंधन का दिन सनातन धर्म का पालन करने वाले लोगों के जीवन का महत्त्वपूर्ण दिन है। मुख्यतः यह दिन इस लिए विशेष है क्योंकि इस दिन ऋग्वेदीय और यजुर्वेदीय शास्त्रों का पाठन करने वाले त्रय-वर्ग के पुरुष अपने पुराने जनेऊ को बदलते हैं,और नया जनेऊ धारण करते हैं। चूंकि वर्तमान समय में ब्रह्‍मणों के अतिरिक्त अन्य वर्ण उपनयन धारण करने से कतराने लगे हैं इसलिए जनेउ बदलने की परंपरा सिर्फ़ ब्रह्‍मणों तक सीमित रह गई है। इस दिन जनेऊ धारण करने वाले ऋग-यजुर्वेदीय साधक किसी नदी या सरोवर के तट पर जाते हैं और वेदिक मंत्रों के साथ नई जनेऊ धारण करते हैं । पुरानी जनेऊ जल -प्रवाहित कर दी जाती है । जनेऊ धारण का मंत्र इस प्रकार है –

ऊँ यज्ञोपवितं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत सहजं पुरुस्तात।

आयुष्यं अग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवितं बलमस्तु तेजः

इसके बाद नया यज्ञोपवित धारण कर अपनी क्षमता के अनुसार सात-ग्यारह-इक्कीस या एक सौ आठ बार गायत्री मंत्र जप करना चाहिए । बहिनें भी इसी अवसर पर भाई को रक्षा बाँधती हैं । मुख्यत: यह त्योहार अपनी परंपराओं और अपने जड़ों से जुड़ने और मान्यताओं के नवीनीकरण का दिन है ।

एक पर्व अनेक नाम

रक्षा बंधन का पर्व हालांकि अपने नाम से और भाई- बहिन के प्रेम को दर्शाने वाले पर्व का पर्याय बन चुका है । किंतु भारत में यह पर्व अन्य कई नामों से भी जाना जाता है । देश के उत्तरी भाग में अधिकांश जगह इसे श्रावणी पर्व के नाम से जानते हैं वहीं हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में इसे जन्यो-पुन्यो , कर्नाटक में ऋग्यजुर्वेद उपाकर्मा, केरल में तिरुवण्णम, महाराष्ट्र में बलेव या नारियल पूर्णिमा आदि कहते हैं । समुद्री क्षेत्रों में नाविक इस दिन वरुण देव को नारियल भेंट कर समुद्र में तूफ़ान आदि न लाने की प्रार्थना करते हैं।

वैश्विक पर्व :

समय के साथ यह पवित्र पर्व अपना वैश्विक रूप धारण कर रहा है । आज विश्व सनातन धर्म से परिचित हो रहा है और उसके साथ ही भारतीय संस्कृति भी विश्व में प्रसारित हो रही है ।भारत के अतिरिक्त अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया , नेपाल, बांग्लादेश , श्रीलंका, थाईलैंड भूटान आदि अनेक देशों के लोग इस पर्व से परिचित हुए हैं और इसे अपनाने लगे हैं।

भारतीय संस्कृति की विशेष सुगंध लिए यह त्योहार अपने -आप में अनूठा है ।विवाहित बहिनों के लिए यह बचपन की सुमधुर याद दोबारा सँजो कर अमर कर देने वाला पर्व है।आज भारतीय परिवारों के द्वारा भले ही मात्र एक या दो बच्चे जन्म देने निर्णय लिए जा रहे हैं । जिस से भाई अथवा बहिन के अनुपात कम हो गए हैं । किसी घर में मात्र बेटियाँ हैं तो किसी घर में मात्र बेटे । फ़िर भी त्योहारों को सामुहिक रूप से मनाने की हमारी आदत के कारण यह पर्व दिनोंदिन विश्व में प्रसारित हो रहा है ।

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