राजा शिबि
भारत भूमि कभी रत्नों से खाली नहीं होती । यहाँ के बहुमूल्य रत्न पन्ना, हीरक और माणिक्य आदि न हो कर उत्तम आचरण युक्त यहाँ के नर -नारी ही हैं । ऐसे ही एक नर रत्न उशीनर नरेश राजा शिबि हुए। आज जहाँ मध्यप्रदेश में उज्जैन स्थित है, वहीं पौराणिक काल में उशीनर राज्य हुआ करता था। उशीनर राज्य अत्यंत संपन्न राज्य था। महाभारत में उशीनर नरेश शिबि की सुँदर कथा का वर्णन है।
पुरुवंश में जन्में राजा शिबि बड़े दयालु , धार्मिक और कर्तव्यपरायण थे। वे बड़े ही धर्मात्मा थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी , सम्पन्न और संतुष्ट थी। उनके अच्छे आचरण के कारण सब उन पर प्रसन्न थे। जनता उनके कार्यों से इतनी संतुष्ट थी कि दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल गई । दुनिया भर में उनके कोई शत्रु न था। वे अजातशत्रु थे। वे निष्ठापूर्वक अपने कार्य करते और ईश्वर का गुणानुवादन कर दुनिया को ईश्वर भक्ति हेतु प्रेरित करते।
राजा शिबि अपनी दानवीरता के कारण भी बहुत प्रसिद्ध थे। जो भी याचक उनके पास आते, वे कभी खाली हाथ न लौटते। उनकी दानशीलता के किस्से स्वर्गलोक तक पहुँच गए। सर्वत्र शिबि की कीर्ति दिन प्रतिदिन फ़ैलने लगी। देवताओं में भी शिबि के बारे में चर्चा होने लगी। देवराज इंद्र और अग्निदेव ने शिबि की दानशीलता और कर्तव्यशीलता की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
एक बार राजा शिबि पास की एक नदी से प्रातः स्नान ध्यान वंदन आदि कर वापस लौट ही रहे थे कि कहीं से एक घायल कबूतर फड़फड़ाता हुआ आकर उनके पैरों में गिर गया। कबूतर बुरी तरह हाँफ रहा था। कपोत की दशा देख शिबि को अनुमान हो गया कि यह कपोत किसी शिकारी पक्षी से जीवन बचाता हुआ उनके पास आ गिरा है। राजा शिबि ने कबूतर को गोद में उठाते हुए कहा कि अब तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है ।

कबूतर ने शिबि से कहा-“महाराज! मेरी प्राण रक्षा कीजिए । आप यहाँ के राजा हैं और मेरी रक्षा करना आपका कर्तव्य है। राजा ने कबूतर को विश्वास दिलाया कि वे कबूतर की जीवन रक्षा का भार अब स्वयं पर लेते हैं। इस प्रकार शिबि ने कपोत को अभयदान प्रदान किया।
इसी समय एक बाज तेज़ी से वहाँ आया और राजा शिबि के चारों और चक्कर काटने लगा। यह देखकर कबूतर अत्यंत भयभीत हो कर काँपने लगा। राजा शिबि ने बाज़ को भगाना चाहा । इस पर बाज़ बोला- महाराज शिबि! तुरंत इस कबूतर को मुझे सौंप दीजिए । यह मेरा शिकार है । अब आप बीच में आ कर मुझे मेरे भोजन से दूर कर रहे हैं ।
राजा शिबि ने कहा- हे विशाल श्येन! यह मेरी शरण में आया है। मैंने इसे अभयदान दिया है । भला शरण में आए जीव को तुम्हें कैसे सौंप सकता हूँ?
बाज़ -“महाराज शिबि! यह कपोत मेरा भोजन है। यदि आप मुझे मेरा भोजन ही न करने देंगे तो भोजन के अभाव मेरी मृत्यु का दोष भी आप पर होगा। आप क्यों चाहते हैं कि आपके राज्य में कोई प्राणी भूखा मर जाए। सोचिए कि इससे आपका कितना अपयश होगा । भला आप कबूतर के लिए अपयश क्यों लेना चाहते हैं?
राजा शिबि- “मुझे अपयश का डर नहीं है, किंतु शरणागत की रक्षा करना भी राजा और क्षत्रिय का धर्म है । अतः मैं इसे तो तुम्हें नहीं दे सकता ।हाँ! इसके भार के बराबर माँस दे कर मैं तुम्हारे जीवन की रक्षा जरूर करुँगा। “
बाज़- “महाराज शिबि! कबूतर के बराबर माँस देने के लिए भी आपको किसी अन्य जीव की हत्या करनी ही पड़ेगी। फ़िर आप इसी कबूतर को मुझे क्यों नहीं दे देते? इस से आपको जीव हत्या का अपराध भी नहीं लगेगा और आपका अहिंसा का सिद्धांत भी बना रहेगा ।यह कबूतर तो मैने ही घायल किया है।”

महाराज शिबि-” तुमने ठीक कहा पक्षीराज श्येन! मैं किसी दूसरे जीव की हत्या नहीं करुँगा । किंतु मैं स्वयं का माँस तो दान कर ही सकता हूँ। रुको जरा! मैं अभी तुला मँगा कर कबूतर के बराबर माँस तुम्हें दान करता हूँ।”
राजा शिबि ने सेवकों से तुला मँगवाई । उन्होंने एक पलड़े पर कबूतर रखा और दूसरे पलड़े पर अपनी जाँघ से थोड़ा सा माँस काट कर तुला में रख दिया। लेकिन सब आश्चर्य से भर गए, जब माँस रखने पर भी कबूतर वाली तुला नीचे झुकी रही । शिबि ने थोड़ा-थोड़ा काटकर कई बार अपना माँस तुला में रखा, किंतु हर बार कबूतर वाला पलड़ा थोड़ा सा भारी रह जाता । राजा शिबि रक्त से लथ-पथ हो गए। उनके सेवक उन्हें और माँस काटने से रोकने लगे। तब राजा शिबि खुद ही तुला पर बैठ गए और अपना सर्वस्व देह शरणागत कबूतर के लिए अर्पण करने को तैयार हो गए।
इसी समय कबूतर के स्थान पर अग्निदेव और बाज़ के स्थान पर इंद्रदेव प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि वे तो शिबि की दानशीलता और कर्तव्यनिष्ठा की परीक्षा ले रहे थे। शिबि ने कठिन परिस्थितियों में भी राजोचित रक्षा करने का धर्म नहीं छोड़ा और संपूर्ण देह-दान कर दानवीरता में भी अद्वितीय हो गए। अग्निदेव और इंद्रदेव महाराज शिबि की कर्तव्यनिष्ठा और दानवीरता से अत्यंत प्रसन्न हुए। इंद्र ने अपने अमृतयुक्त स्पर्श से शिबि के घाव तुरंत भर दिए। दोनों देवताओं ने शिबि को अखंड कीर्ति और यश का आशीर्वाद दिया। इसी समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। मृत्यु के बाद शिबि दिव्य धाम पधारे।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि मनुष्य को भगवद्भजन करने के लिए घर -परिवार छोड़ने की सर्वदा आवश्यकता नहीं है। अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक करते हुए भी भक्ति की जा सकती है। जो जहाँ जिस स्थान पर हैं, वहीं अपने कर्तव्यपालन करते हुए भगवद्भजन करें । यही सबसे बड़ी तपस्या है।
( मूलकथा का स्रोत : महाभारत )


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