किसी भी भाषा के शुद्ध व्यवहार के लिए हमें भाषा के नियम जानने की आवश्यकता होती है। भाषा के नियम हमें व्याकरण से मिलते हैं। प्रायोगिक स्तर पर वाक्य भाषा की मूलभूत इकाई होती है। वाक्यों के गठन से ही हमें पदों और पदबंधों की जानकारी मिलती है।

व्याकरण भाषा की संरचना और नियमों का वह समूह है, जो शब्दों, वाक्यों और उनके आपसी संबंधों को सही तरीके से प्रस्तुत करता है। ‘व्याकरण’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसमें ‘वि’ का अर्थ ‘अलग’ और ‘आकरण’ का अर्थ ‘व्यवस्थित करना’ होता है। इस प्रकार, व्याकरण वह प्रणाली है जो शब्दों, वाक्यों और ध्वनियों को सही रूप में व्यवस्थित और परिभाषित करती है।

हिंदी व्याकरण  के जनक बनारस के दामोदर पंडित माने जाते हैं, जिनके द्वारा लिखित द्विभाषी ग्रंथ उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण 12वीं शताब्दी में लिखा गया माना जाता है।

हिंदी और संस्कृत के संदर्भ में, व्याकरण के प्रमुख अंग हैं:

  1. वर्ण रचना- इसमें मुख्यतः वर्णों के आकार, उच्चारण, भेद आदि के संबंध में विचार किया जाता है। वर्णों से मिलकर शब्द बनते हैं।
  2. शब्द रचना – इसमें शब्दों के रूप, भेद , आदि का अध्ययन किया जाता है। मूल शब्दों, उपसर्गों और प्रत्ययों , समास आदि का प्रयोग कर नए शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया समझी जाती है।
  3. वाक्य रचना – यह शब्दों को वाक्य में सही क्रम में व्यवस्थित करने के नियम बताता है ताकि उसका सही अर्थ निकल सके।
  4. छंद रचना – छंद रचना हिंदी व्याकरण का चौथा और महत्त्वपूर्ण भाग है, जिसके अंतर्गत वाक्य के साहित्यिक स्वरूप से संबंधित विषयों पर चर्चा की जाती है। इसमें छंद की परिभाषा, प्रकार आदि पर चर्चा की गयी है।
  5. संधि – यह दो ध्वनियों या शब्दों के मिलने पर उनके मेल से बनने वाले रूपों के नियमों को समझाता है।
  6. समास – इसमें दो या अधिक शब्दों को जोड़कर नए अर्थ वाला समास शब्द बनाने की प्रक्रिया होती है।

व्याकरण का महत्त्व यह है कि यह दूसरों के सामने अपने विचार आसानी से व्यक्त करने और भावनाओं के संप्रेषण में सहायक होता है और साथ ही दूसरे की भावनाओं और विचारों को स्पष्ट रूप से समझने में सहायक होता है।

संक्षेप में, व्याकरण किसी भाषा का सही और स्पष्ट प्रयोग सुनिश्चित करता है ताकि संवाद में सटीकता और स्पष्टता बनी रहे।

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