रैदास के पद -कक्षा 9वीं- गंगा पाठ-8 : भावार्थ, प्रश्न -उत्तर

पद1
अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करे रैदासा॥
भावार्थ
इस पद में संत रैदास ने भगवान के प्रति अपनी गहन भक्ति और पूर्ण समर्पण को व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि अब उनका मन प्रभु के नाम में इतना रम गया है कि उसे छोड़ना संभव नहीं है। वे अपने और ईश्वर के संबंध को विभिन्न उपमाओं द्वारा स्पष्ट करते हैं।
रैदास कहते हैं कि जैसे चंदन की सुगंध पानी में घुलकर उसे सुगंधित बना देती है, वैसे ही प्रभु का प्रभाव उनके जीवन के प्रत्येक अंग में व्याप्त है। जिस प्रकार मोर बादलों को देखकर प्रसन्न होकर नृत्य करता है और चकोर चंद्रमा को एकटक निहारता है, उसी प्रकार उनका मन सदा प्रभु के दर्शन के लिए उत्सुक रहता है। वे स्वयं को दीपक की बाती और प्रभु को दीपक मानते हैं, जिनके कारण उनके जीवन में ज्ञान और भक्ति का प्रकाश निरंतर जलता रहता है।
आगे वे कहते हैं कि जैसे धागा मोती को पिरोकर उसकी शोभा बढ़ाता है और सोने में सुहागा मिल जाने पर उसका सौंदर्य और बढ़ जाता है, उसी प्रकार उनका जीवन प्रभु से जुड़कर सार्थक और सुंदर बन गया है। अंत में वे स्वयं को प्रभु का सेवक और प्रभु को अपना स्वामी मानते हुए ऐसी अटूट भक्ति की कामना करते हैं।
केंद्रीय भाव:
इस पद में संत रैदास ने ईश्वर और भक्त के अटूट, अभिन्न तथा प्रेमपूर्ण संबंध का वर्णन किया है तथा सच्ची भक्ति, समर्पण और ईश्वर-प्रेम की महिमा का गुणगान किया है।
पद 2
जो तुम तोरो राम, मैं नहिं तोरौं, तुम सों तोरि कवन सों जोरौं।
तीरथ बरत न करौं अंदेशा, तुम्हरे चरण कमल का भरोसा।
जहँ-जहँ जाऊँ तुम्हरी पूजा, तुम-सा देव और नहिं दूजा।
मैं अपने मन हरि सों जोरी, हरि सों जोरि सबन सों तोरी।
सबही पहर तुम्हरी आसा, मन, क्रम, वचन कहै रैदासा॥
भावार्थ
इस पद में संत रैदास भगवान के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि यदि प्रभु उनसे संबंध तोड़ भी दें, तब भी वे प्रभु का साथ नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि प्रभु के अतिरिक्त उनका कोई दूसरा सहारा नहीं है। उन्हें तीर्थ-यात्रा, व्रत या अन्य धार्मिक कर्मकांडों पर विश्वास नहीं है; वे केवल भगवान के चरणों को ही अपना आधार मानते हैं।
रैदास कहते हैं कि वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं प्रभु की उपासना करते हैं, क्योंकि उनके समान कोई दूसरा देवता नहीं है। उन्होंने अपने मन को पूरी तरह भगवान से जोड़ लिया है और संसार के अन्य मोह-माया से अपने संबंध तोड़ लिए हैं। दिन-रात, हर समय उनकी आशा और विश्वास केवल प्रभु पर ही टिका रहता है। अंत में रैदास कहते हैं कि वे मन, वचन और कर्म से निरंतर भगवान का स्मरण और भक्ति करते हैं।
केंद्रीय भाव
इस पद में संत रैदास ने ईश्वर के प्रति अटल विश्वास, पूर्ण आत्मसमर्पण तथा बाहरी आडंबरों से रहित सच्ची भक्ति का वर्णन किया है। उनके अनुसार भगवान ही जीवन का एकमात्र सहारा हैं और उन्हीं से जुड़कर सच्चा सुख एवं मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
A.नीचे दी गई पंक्तियों के भावार्थ स्पष्ट कीजिए-
(क) “प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।” — भावार्थ
संत रैदास इस पंक्ति में भगवान के प्रति अपनी गहरी भक्ति और प्रेम व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि हे प्रभु! आप वर्षा करने वाले मेघ (बादल) के समान हैं और मैं मोर के समान हूँ। जिस प्रकार मोर बादलों को देखकर आनंद से नाच उठता है, उसी प्रकार आपके दर्शन से मेरा हृदय आनंदित हो जाता है। जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को एकटक निहारता रहता है, उसी प्रकार मैं भी सदा आपके दर्शन की अभिलाषा में लगा रहता हूँ। मेरे जीवन का एकमात्र आधार और लक्ष्य आप ही हैं।
प्रश्न 2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर: संत रैदास ने तीर्थ-यात्रा, व्रत और बाहरी आडंबरों की अपेक्षा भाव-भक्ति, सच्ची श्रद्धा और पूर्ण समर्पण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार ईश्वर को पाने के लिए बाहरी दिखावे, तीर्थ-यात्राओं या उपवासों की अपेक्षा सच्ची श्रद्धा अधिक आवश्यक है। उनके विचार में भक्ति हृदय से उत्पन्न होती है, न कि केवल धार्मिक कर्मकांडों से।
मेरे विचार से भक्ति के प्रमुख आधार श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, समर्पण, सेवा-भाव, सत्य आचरण और ईश्वर के प्रति अटूट नि
B. मेरी समझ, मेरे विचार
प्रश्न 1. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर: रैदास की अपने प्रभु राम में अगाध निष्ठा और आस्था है। वे उन्हें ही ईश्वर, कर्ता-धर्ता और सर्वस्व मानते हैं। वे मानते हैं कि उन्हीं से उनके जीवन का उद्धार होगा। अतः वे किसी भी सूरत में उनसे संबंध नहीं तोड़ना चाहते, उनसे दूर नहीं होना चाहते। वे कहते हैं कि भगवान आप भले ही मुझ से संबंध तोड़ दें पर मैं आप से संबंध नहीं तोड़ सकता। इस तरह वे ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा का भाव दर्शाते हैं।
प्रश्न 2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर: संत रैदास के अनुसार सच्ची भक्ति का आधार बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि हृदय की निर्मल भावना और ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा है। उनका विश्वास है कि जीवात्मा और परमात्मा का संबंध अत्यंत गहरा है। जीव उसी परमात्मा का अंश है, इसलिए दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। रैदास मानते हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन में सच्चा प्रेम, श्रद्धा और आत्मसमर्पण होना चाहिए। इसी कारण वे तीर्थ-यात्रा, व्रत और उपवास को भक्ति का अनिवार्य साधन या अंग नहीं मानते, क्योंकि उनके अनुसार निष्कपट भाव ही भक्ति का वास्तविक मार्ग है।
मेरे विचार से, भक्ति का एकमात्र आधार है- अनन्य भक्ति और अटूट निष्ठा ही भक्ति के सच्चे साधन हैं।
प्रश्न 3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों / उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
उत्तर: पदों में आराध्य और भक्त के अनन्य संबंधों को निम्नलिखित उपमाओं और प्रतीकों से व्यक्त किया
गया है- चंदन – पानी, दीपक – बाती, प्रभु – भक्त, बादल और वन – मोर, चंद्रमा – चकोर, सोना – सुहागा, मोती – धागा¸ स्वामी – दास, राम (ईश्वर) – भक्त (रैदास)।
C. कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।

उत्तर:

D. विषयों से संवाद
प्रश्न 1. तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?
(संकेत – आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर: रैदास के युग में भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था और देशभर में भक्ति की धारा प्रवाहित हो रही थी। उस समय एक ओर मुस्लिम शासकों द्वारा मंदिरों और मूर्तियों का विरोध किया जा रहा था, तो दूसरी ओर हिंदू समाज में धर्म के नाम पर अनेक बाहरी आडंबर, जैसे व्रत, उपवास, तीर्थयात्राएँ और कर्मकांड प्रचलित थे। ऐसे समय में संत कवियों ने एक नई दिशा प्रदान की। उन्होंने भक्ति को बाहरी दिखावे से मुक्त कर आंतरिक श्रद्धा और ईश्वर-प्रेम पर बल दिया। संतों ने निर्गुण या निराकार ईश्वर की उपासना का मार्ग अपनाया, जिससे भक्ति की भावना सुरक्षित रह सकी। रैदास के ‘राम’ सिर्फ़ दशरथ पुत्र या किसी विशेष रूप या मूर्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सर्वव्यापी, निराकार परमात्मा के प्रतीक हैं। इस प्रकार संतों की यह विचारधारा उस समय की कठिन परिस्थितियों में भक्ति और धार्मिक सौहार्द को बनाए रखने का एक प्रभावी माध्यम बनी।
प्रश्न 2. “सोने मिलत सुहागा”
‘सुहागा’ एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर: छात्र स्वयं करें।




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