अतीत की परछाइयों में, उजियारा अब भी जलता है,
हर शौर्य गाथा के संग, स्वाभिमान पलता है।
धूल में सने वे क़दम, इंक़लाब की छाप लिए,
टूटे हुए सिंहासन भी, गौरव का ख़िताब लिए।

वीरों के रक्त से सींची, जब थी धरती मुस्काई ,
उनके साहस की गूंज, अब तक देती सुनाई ।
जब वचनों में दृढ़ता थी, और संकल्पों में ज्वाला ,                                                                    हर पीढ़ी के स्वप्नों में, है चंद्रगुप्त जागने वाला ।  

जब गुरुकुल की मिट्टी में, तप का सोना गलता था,
गुरु के एक ईशारे पर, एकलव्य अँगूठा देता था।
हर कण में था धर्म बसा, हर साँस में आदर्श जगे,
अतीत के उन दीपों से, वर्तमान का तिमिर हटें।

धन, पद, वैभव सब तुच्छ हुए , जब बना सत्य आलंबन,
सीता जैसा त्याग और, राम की मर्यादा का संबल ।
संग्रामों से जो सीखा, वह थमा नहीं लहरों में,
वह बसा हुआ है अब भी, आने वाले प्रहरों में।

यह इतिहास नहीं केवल,  है यह जीती-जागती आग ,
हर पतन की राख के नीचे ,छिपा नव अभ्युदय का चिराग ।                                                   
जो बीत गया, वह बीज ,अंकुरित होगा भविष्य के खेत में,
हम गर्व से उसे सींचें, अपने देश और स्वजनों के हित में।

स्वरचित कविता: कुसुम लता जोशी 

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