Good Habbits for kids :

बच्चों को बढ़ा करना और सुयोग्य नागरिक बनाना हर माता -पिता का सपना तो होता ही है , यह उनका कर्तव्य भी है । किंतु कई बार कुछ छोटी -छोटी बातें जो हमारे ध्यान में नहीं आतीं,किंतु बच्चों की परवरिश में और उनके जीवन में इन बातों का गहरा असर पड़ता है। इन बातों से न केवल बच्चों का जीवन सरल और आसान हो जाता है , इसके साथ ही वे एक अच्छे नागरिक और सफ़ल व्यक्ति भी बनते हैं।

आप अपने बच्चों को सिर्फ़ अपने आनुवांशिक गुण ही नहीं देते, आप अपनी अच्छी और बुरी आदतें भी बच्चों को देते हैं । और आप चाहें या न चाहें , बच्चे आपसे ये आदतें जाने-अनजाने सीख ही लेते हैं । आगे चलकर आपके न रहने पर भी वे इन आदतों को जीवन भर ओढ़े रहते हैं। उनका जीवन इन सब आदतों से प्रभावित होता है। इसलिए आपको भी बच्चों को अच्छी आदतें सिखाने के लिए इन आदतों को अपनाना चाहिए।

1.संपूर्ण भोजन ग्रहण करने की आदत:

अकसर देखा जाता है कि बच्चे सिर्फ़ अपने मनपसंद भोजन ही खाते हैं । जो पदार्थ उन्हें पसंद होते हैं, वे बार-बार अपने माता-पिता से उसे बनाने की माँग करते हैं और दूसरे पौष्टिक पदार्थ नहीं खाते । माता-पिता भी उनकी इस आदत को बढ़ावा देते हैं । कई बार घरों में स्थिति यह होती है कि जितने लोग घर में है । उतने ही व्यंजन बनाए जा रहे होते हैं । इस से समस्या यह होती है कि भोजन की बहुत बर्बादी होती है । दूसरी समस्या यह है कि इस से बच्चों को संपूर्ण पोषण नहीं मिलता । जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रह पाता। कई बार अच्छे धनी -मानी घरों के बच्चे भी इसी आदत के कारण अकसर बीमार पड़ते रहते हैं । कई बार बड़ी आयु तक भी उनकी यही आदत बनी रहती है । एक स्वस्थ नागरिक के रूप में बने रहने के लिए हमें अपने बच्चों में संपूर्ण भोजन खाने की आदत का विकास करना चाहिए ।

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2. सफ़ाई की आदत:

बच्चों में सफ़ाई की आदत का विकास करना बहुत ही जरूरी है। बचपन से ही उनमें सभी वस्तुएँ उनके स्थान पर रखने की आदत डालनी चाहिए। कूड़ा हमेशा कूड़ेदान पर डालना सिखाना चाहिए।न केवल घर अपितु घर के बाहर जहाँ कहीं भी हों सफ़ाई का ध्यान रखने से सभी को सुविधा हो जाती है। भारतीय समाज की यह बड़ी समस्या है कि हम अपने घरों को साफ़-सुथरा रखना तो अपनी जिम्मेदारी समझते हैं किंतु घर से बाहर निकलते पर अपने आस-पास अथवा सार्वजनिक स्थानों में गंदगी फ़ैलाना अपना अधिकार समझ लेते हैं ।सड़क, रेल, बस , पार्क , अथवा अन्य कोई भी सार्वजनिक स्थान हो , कहीं भी कूड़ा फ़ेंक कर आगे निकल जाते हैं । किंतु दूसरी ओर जब हमें उन्हीं गंदे रास्तों से गुजरना होता है तो हम प्रशासन को कोसते हैं । अपने बच्चों को सिखाएँ कि वे चाहें कहीं भी हों , सफ़ाई का जरूर ध्यान रखें । सफ़ाई से न केवल स्वास्थ्य उत्तम रहता है , मन भी प्रसन्न रहता है । साथ ही आपका आत्मविश्वास भी मज़बूत होता है । बच्चों को सफ़ाई की आदत डालना माता-पिता की प्रमुख जिम्मेदारी है ।

3. सफ़लता और असफ़लता को समान रूप से स्वीकार करना:

सभी चाहते हैं कि आगे चल कर हमारी संतान सफ़लता प्राप्त करते रहे। उनके जीवन में प्रगति के अवसर आते रहें । लेकिन कई बार ऐसा संभव नहीं हो पाता । ऐसे अवसर पर अपने बच्चों को सिखाएँ कि सफ़लता और असफ़लता जीवन के दो समान पहलू हैं । इन्हें समान रूप से स्वीकार करने की आदत का विकास बहुत ही जरूरी है । जो बच्चे असफ़लता को नहीं झेल पाते , उन्हें आगे चल कर तनाव , ब्लड प्रेशर और अवसाद आदि की समस्याएँ घेर लेती हैं । वे अपने को अपमानित महसूस करते हैं ।बच्चों को सिखाएँ कि असफ़लता तब तक असफ़लता नहीं होती , जब तक सामने वाला मन से हार स्वीकार न कर ले। मनुष्य के हाथ में बस प्रयत्न है । अगर असफ़लता मिली है तो सफ़लता के कई अवसर मिलेंगे। अत: सफ़लता और असफ़लता को समान रूप से स्वीकार करने की योग्यता का विकास बहुत जरुरी है ।

व्यायाम करने की आदत

4. व्यायाम :

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। अत: शरीर को स्वस्थ रखना बहुत जरूरी है। व्यायाम से मोटापा दूर होता है। शरीर अपने उचित स्वरूप में बना रहता है। इसके लिए यदि बच्चों में बचपन से ही किसी प्रकार के व्यायाम , योग अथवा किसी प्रकार के खेल आदि आदत का विकास किया जाए तो यह आदत जीवन भर बनी रहती है। अत: माता-पिता को स्वयं भी किसी प्रकार का व्यायाम जरूर करना चाहिए। यही आदत बच्चों में भी विकसित करनी चाहिए।

5. ध्यान की आदत:

ध्यान करने से न केवल मन शांत रहता है अपितु तरह -तरह के कुविचार भी मन से हट जाते हैं । तनाव दूर होता है। उचित निर्णय करने की शक्ति का विकास होता है । आध्यात्मिक विकास भी होता है । अत: बच्चों में प्रत्येक दिन कम से कम पंद्रह -बीस मिनट के लिए ध्यान करने की आदत डालनी चाहिए।

6.पढ़ने की आदत :

बच्चोंं को छोटेपन से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए । बेड टाइम स्टोरी हो या फ़िर चित्रकथा पढ़ना , बच्चों में धीरे-धीरे पढ़ने की आदत डालनी चाहिए । लेकिन अगर आप स्वयं टी.वी. मोबाइल आदि में लगे रहेंगे, तो बच्चे क्यों कर पढ़ेंगे? अच्छा तो यह है कि हर माता -पिता को समय निकाल कर एक या दो घंटा बच्चों के साथ पढ़ने का अभ्यास कराना चाहिए । घर का प्रत्येक व्यक्ति उस समय अपनी अवस्था के अनुरूप पुस्तकें पढ़ने का अभ्यास करें । किताबें पढ़ने से बच्चों का मानसिक विकास होता है । नई- नई जानकारी प्राप्त होती है और उनके सफ़लता के अवसर और सोचने समझने की योग्यता बढ़ती जाती है ।आगे चलकर वे एक सजग और बुद्धिमान नागरिक बनते हैं ।

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7. मित्र बनाने की आदत :

मनुष्य सामाजिक प्राणी है । बिना समाज के हम अधूरे हैं मन और शरीर के उत्तम विकास के लिए मित्रों का होना बहुत ही आवश्यक है। अपने दोस्तों , साथियों से खेलना , हँसी- मजाक करना न केवल शारीरिक अपितु मानसिक स्वास्थ्य के भी अत्यावश्यक है। इसके साथ ही बच्चे अपने दोस्तों के साथ अनेक प्रकार की वस्तुएँ सांझा करना , उचित सामाजिक व्यवहार करना , समस्याएँ सुलझाना ,आपसी सहयोग से मिलजुल कर कार्य करना सीखते हैं । अच्छे मित्र आगे बढ़ने में भी सहयोग करते हैं ।

अत: बच्चों को विभिन्न तरह से , विभिन्न वर्ग के मित्र यथा स्कूल के मित्रों के ग्रुप , घर के आसपास के बच्चों से मित्रता , अपने मित्रों के बच्चों के साथ मित्रता करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और मित्रता के पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए। किंतु मित्रता के साथ ही समय का सही उपयोग भी जरूरी है। मित्र ऐसे न हों कि वे समय बर्बाद कराएँ , जिससे बच्चों की पढ़ाई या शिक्षा बाधित हो। याद रखें , इस दुनियाँ में हमारे मित्रों की संख्या जितनी ज्यादा होगी , जीवन हमारे लिए उतना ही सरल और आनंदमय हो जाएगी ।

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8. बुद्धिमत्ता पूर्वक धन का इस्तेमाल:

अकसर देखा जाता है कि जब बच्चे छोटे होते हैं तो माता-पिता उनको सब वस्तुएँ खुद खरीदकर देते हैं । धन का सही इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए यह बताना अक्सर माता-पिता भूल जाते हैं । वे अपने बच्चों के लिए सेंटा क्लास तो बन जाते हैं , किंतु एक महत्त्वपूर्ण अध्याय ” धन का बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल” से अपने बच्चों को वंचित कर देते हैं । यही बच्चे जब युवा हो कर खुद अर्थोपार्जन करते हैं , तो उन्हें खुद पता नहीं होता कि किस प्रकार इस धन का प्रयोग किया जाए। अपने धन का कहाँ निवेश किया जाए अथवा किस प्रकार इसका उचित उपयोग हो। कई बार कुछ चतुर लोग उन्हें मूर्ख बनाने से बाज़ नहीं आते ।

बच्चों को बचपन से ही थोड़ा बहुत पैसा देकर उसके इस्तेमाल करने की पूर्ण आजादी देनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि धन एक महत्त्वपूर्ण तत्व है । धन के प्रति न तो अरुचि हो , न अत्यधिक लगाव हो। उन्हें सिखाना चाहिए कि किस प्रकार धन का प्रयोग अपनी सुख सुविधाओं और कठिन समय के लिए किया जाए। बुद्धिमत्तापूर्ण धन का उपयोग किया जाए । थोड़ा बड़े होने पर उन्हें बैंक , शेयर बाजार आदि की भी जानकारी देनी चाहिए।

9. सामान खरीदना:

बच्चों को कभी- कभी स्वयं सामान खरीदने के अवसर भी देने चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि किस प्रकार थोड़ा- बहुत मोलभाव करने में कोई हानि नहीं है। उन्हें यह आदत डालनी चाहिए कि वे सामान खरीदने से पहले उस सामान के उचित मूल्य , लेबेल(lebels) , प्रयोग करने की अंतिम तारीख (expiry date), फ़्री ऑफ़र्स (free offers) छूट (discount) आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करें । इन सबसे उन्हें दुकानदारों द्वारा ठगे जाने की संभावना भी कम हो जाएगी । इसके साथ ही यह आदत उनको जीवन भर लाभ पहुँचाएगी ।

10. समय पर घर वापस लौटने की आदत :

जीवन में कितनी भी व्यस्तता हो , किंतु घर ऐसी जगह होता है , जहाँ सुकून मिलता है। यह सुकून और भी बढ़ जाता है जब शाम को सब समय पर घर में उपस्थित मिलते हैं । इससे सबको सुरक्षा और सुख मिलता है। समय पर अपने बच्चों को घर लौटने की आदत डालें ।विशेषकर किशोरावस्था और युवा होते बच्चों के वापस लौटने का समय निश्चित कर देना चाहिए। उन्हें कुछ समय अपने साथ खुलकर बातचीत का समय देना चाहिए । सुनिश्चित करें कि यदि कोई विशेष कारण न हो तो रात का भोजन सब साथ करें । एक दुसरे के साथ खुल कर बात चीत करें । साथ भोजन करने से आपसी संबंध अच्छे होते हैं । परिवारीजनों से लगाव बढ़ता है। और सबसे विशेष बात , रात देर तक बाहर रहने से युवा हो रहे बच्चों में नशे की आदतें , बुरी संगत का प्रभाव पड़ सकता है। यदि वे समय पर घर पर रहेंगे तो समाज के इन कुप्रभावों से बचे रहेंगे ।

खुद में , अपने बच्चों में इन अच्छी आदतों के विकास के साथ हम अपने बच्चों के सफ़ल जीवन में तो सहयोगी बनेंगे ही , साथ ही आने वाले समाज को उत्तम बनाने में भी सहयोग देंगे ।

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