इस दोहे में बिहारी ने कुसंगति के दुष्प्रभाव का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति बुरी संगति में पड़ जाता है, उसे सद्बुद्धि प्राप्त नहीं होती। जैसे कपूर के साथ रखने पर भी हींग अपनी दुर्गंध नहीं छोड़ती, उसी प्रकार कुसंग में पड़ा व्यक्ति आसानी से अपने दुर्गुणों का त्याग नहीं करता। यह दोहा सत्संग का महत्त्व और कुसंग से बचने की प्रेरणा देता है।

  • भाषा: साहित्यिक एवं परिमार्जित ब्रजभाषा।
  • शैली: दोहा शैली में संक्षिप्त, सारगर्भित एवं उपदेशात्मक अभिव्यक्ति।
  • अलंकार:
    • दृष्टांत अलंकार – कुसंगति के प्रभाव को हींग और कपूर के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है।
    • अनुप्रास अलंकार – “संगति–सुमति” तथा “कुमति” शब्दों में समान वर्णों की आवृत्ति से ध्वनि-सौंदर्य उत्पन्न हुआ है।
  • रस: शांत रस (नीतिपरक भाव प्रमुख)।
  • छंद: दोहा।

3. भाषा एवं शब्द-चयन

कवि ने सरल, मधुर एवं प्रभावशाली ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। हींग और कपूर के उदाहरण द्वारा गूढ़ जीवन-सत्य को अत्यंत सहज रूप में प्रस्तुत किया गया है।

यह दोहा सिखाता है कि कुसंगति मनुष्य के विवेक और सद्बुद्धि का नाश कर देती है। इसलिए व्यक्ति को सदैव अच्छी संगति अपनानी चाहिए और बुरे लोगों के साथ रहने से बचना चाहिए।

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