ये न यहाँ नागर बढ़ी, जिन आदर तौ आब/ye na ihaa nagar badi jin aadar tau aab

इस दोहे में कवि ने गुणों के पारखी और सम्मान के महत्त्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। कवि कहते हैं कि जहाँ गुणों को पहचानने और उनका आदर करने वाले लोग नहीं होते, वहाँ श्रेष्ठ व्यक्ति की प्रतिभा का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता। जैसे गाँव में गुलाब का फूल खिले या न खिले, उसकी सुंदरता और सुगंध का उचित सम्मान नहीं होता, उसी प्रकार गुणी व्यक्ति भी अयोग्य और अनपारखी लोगों के बीच उपेक्षित रह जाता है। यह दोहा समाज को योग्य व्यक्तियों का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।

  • भाषा: साहित्यिक एवं परिमार्जित ब्रजभाषा
  • शैली: दोहा शैली में संक्षिप्त, मार्मिक एवं सूक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति।
  • अलंकार:
    • अन्योक्ति अलंकार – गुलाब के माध्यम से गुणी व्यक्ति तथा गाँव के माध्यम से गुणों के अनपारखी समाज का संकेत किया गया है।
    • अनुप्रास अलंकार – “फूल्यो–अनफूल्यो” तथा “गंवई–गाँव” में ध्वनि-सौंदर्य उत्पन्न हुआ है।
  • रस: नीति रस (शांत रस की अनुभूति भी होती है।)
  • छंद: दोहा।

कवि ने सरल, मधुर एवं प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। “गुलाब” गुणी एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति का तथा “गंवई गाँव” गुणों के अपरखी समाज का प्रतीक है। कम शब्दों में गहन जीवन-दर्शन प्रस्तुत करना बिहारी की विशेषता है।

यह दोहा सिखाता है कि प्रतिभा और गुणों का वास्तविक मूल्य तभी होता है, जब उन्हें परखने वाले, पहचानने और सम्मान देने वाले लोग उपस्थित हों। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को गुणों का आदर करना चाहिए तथा योग्य व्यक्तियों को उचित सम्मान देना चाहिए।

महाकवि बिहारी का जीवन-परिचय
या अनुरागी चित्त की-बिहारी /ya anuragi chitt ki- Bihari
रैदास के पद -कक्षा 9वीं- गंगा पाठ-8 : भावार्थ, प्रश्न -उत्तर

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