या अनुरागी चित्त की-बिहारी /ya anuragi chitt ki- Bihari
बिहारी
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।।
ज्यौं-ज्यौं बूड़े स्याम रंग, ज्यौं-ज्यौं उज्जलु होई॥
संदर्भ :
यह दोहा सुप्रसिद्ध भक्त कवि बिहारी जी द्वारा रचित है । इस दोहे में कवि अपने कृष्ण प्रेमी हृदय की स्थिति बता रहे हैं।
व्याख्या :
प्रस्तुत दोहे में कवि बिहारी कहते हैं कि इस भगवद् (कृष्ण ) प्रेमी हृदय की स्थिति कौन जान सकता है? अर्थात इस अनुरागी हृदय की गति अद्भुद है। जैसे -जैसे यह काले रंग वाले स्याम (अर्थात ईश्वर) का चितंन करता है, वैसे-वैसे यह और अधिक उज्जवल और पवित्र होता जाता है।
काव्य-सौंदर्य
पद:
“या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।
ज्यौं-ज्यौं बूड़े स्याम रंग, त्यौं-त्यौं उज्जलु होई॥”
1. भाव-सौंदर्य
इस दोहे में कवि ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति सच्चे प्रेम (अनुराग) की अद्भुत महिमा का वर्णन किया है। संसार में सामान्यतः किसी रंग में डूबने पर वस्तु का अपना रंग बदल जाता है, परन्तु कृष्ण-प्रेम का प्रभाव इसके विपरीत है। भक्त जितना अधिक श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबता जाता है, उसका मन उतना ही निर्मल, पवित्र और उज्ज्वल होता जाता है। प्रेम की इस रहस्यमयी अवस्था को सामान्य व्यक्ति समझ नहीं सकता।
2. शिल्प-सौंदर्य
- भाषा: साहित्यिक ब्रजभाषा का मधुर एवं सरस प्रयोग।
- शैली: दोहा शैली में भावपूर्ण एवं प्रभावशाली अभिव्यक्ति।
- अलंकार:
- विरोधाभास अलंकार – “श्याम रंग” (काला रंग) में डूबने पर भी “उज्ज्वल” होना, जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है।
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार – “ज्यौं-ज्यौं” तथा “त्यौं-त्यौं” शब्दों की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है
- रस: भक्ति रस।
- छंद: दोहा।
3. भाषा एवं शब्द-चयन
कवि ने सरल, मधुर एवं प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। “श्याम रंग” श्रीकृष्ण के प्रेम का प्रतीक है तथा “उज्ज्वल” मन की पवित्रता और आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है।‘
4. संदेश
यह दोहा बताता है कि ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम मनुष्य के हृदय को शुद्ध, निर्मल और सद्गुणों से युक्त बना देता है। जितना अधिक व्यक्ति भगवान के प्रेम में लीन होता है, उसका जीवन उतना ही प्रकाशमय और पवित्र बनता है।



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