एक बार की बात है किसी राजा को एक बकरा मिला। बकरा बहुत दुःखी था। राजा ने बकरे से उसके दुःखी होने का कारण पूछा। बकरे ने कहा- राजन! आप जैसे महान राजा के राज्य में रहते हुए भी मैं हमेशा भूखा और अतृप्त रहता हूँ। मेरे दुःखी होने का कारण यही है।
राजा उस बकरे को अपने साथ राजमहल में ले आया और उसे भरपूर घास खिला कर संतुष्ट करने की कोशिश की।लेकिन बकरे को जितनी बार भी हरी घास खिलाई जाए , बकरा हमेशा घास खाने को उत्सुक ही रहता था। ऐसा मालूम होता मानो बकरा अभी भी भूखा ही हो।
राजा उस बकरे की खाने की इतनी अधिक इच्छा को देख कर हैरान हो गया। उसने सोचा कि शायद इस बकरे को वह पेट भर नहीं खिला पा रहा। इसलिए उसने राज्य भर में घोषणा कर दी कि जो कोई भी व्यक्ति इस बकरे को भरपेट घास खिला देगा उसे वह अपने राजकोष का पूरा धन दे देगा ।
राजा का प्रस्ताव रोचक और आकर्षक था। राजा की घोषणा सबके बीच चर्चा का विषय बन गई।बस एक बकरे को भरपेट खिलाओ और राजकोष का पूरा धन पाओ। राज्य के अनेक लोग उत्साहित हो कर राज महल की ओर चल पड़े। राजा ने सभी लोगों को अवसर प्रदान किया। नियम के अनुसार हर रोज़ एक आदमी को पूरा दिन बकरे को भरपेट खिलाने का अवसर मिलेगा और शाम को राजा के पास बकरा वापस लाना होगा।
हर रोज एक आदमी बकरे को अपने साथ घास खिलाने ले जाता । शाम को राजा के सामने बकरा पेश किया जाता। राजा बकरे की तरफ़ ताज़ी हरी घास बढ़ाता। घास देखते ही बकरा बड़ी उत्सुकता से घास खाने लगता। राजा उस आदमी से कहता-“अरे! यह बकरा तो अभी भूखा ही है , और तुम इसे भूखा ला कर राजकोष की कामना करते हो?” और वह व्यक्ति शर्त हार जाता।
इस तरह अनेक लोग आए और बकरे का पेट भरने की कोशिश की किंतु अंत में वे सब शर्त हार जाते, क्योंकि समय के साथ बकरे की खाने की क्षमता भी बढ़ती गईं।
एक दिन एक किसान राजा के पास आया। उसने बकरे की सारी कहानी सुन रखी थी। वह राजा से बकरा ले कर एक सुंदर और विशाल घास के मैदान में आ गया।जैसे ही बकरे ने घास खानी शुरू की , उसी समय किसान ने बकरे के पीठ में जोर से डंडे से मारा। बेचारा बकरा! अब तक तो लोग उसे राजा का बकरा समझ कर पुचकारते रहते थे, किंतु अब उसे डंडा पड़ रहा था। ऐसा कई बार हुआ। जब जब बकरा घास खाता उसके पीठ में डंडा पड़ता। घबरा कर बकरे ने घास खाना छोड़ दिया , क्योंकि उसके दिमाग में बैठ गया कि घास खाते ही डंडा पड़ेगा।
शाम होते ही बकरे को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया। राजा ने बड़े प्यार से बकरे की पीठ में हाथ फ़ेरा और उसके सामने हरी ताज़ा घास रखवाई। किंतु सुबह से मार खाकर बकरा इतना डरा हुआ था कि उसने हरी घास को मुँह भी नहीं लगाया। यह देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गया। उसने अपने राजकोष का सारा धन किसान को दे दिया।
साथियों! इस कहानी में जो बकरा है वह है हमारा मन ! जिसकी अनगिनत इच्छाएँ हैं । जो बस नई नई वस्तुओं की कामना करता है। इस मन को चाहे जितना भी संतुष्ट करने की कोशिश करो, यह हमेशा भूखा और असंतुष्ट ही रहेगा। आत्म संयम वह डंडा है, जिसके द्वारा यह मन नियंत्रित होता है । मन की इच्छाओं पर नियंत्रण के लिये आत्म-संयम अत्यंत आवश्यक है । ईश्वर वह राजा हैं जो हमें सब प्रकार से प्रसन्न रखना चाहते हैं और परिपूर्ण देखना चाहते हैं किंतु मन के वशीभूत हम हमेशा असंतुष्ट और दुःखी ही रहते हैं तब वह हमें आत्मसंयम का रास्ता दिखाते हैं।
साथियों!यह कहानी मुझे एक दूसरे पक्ष में भी दिखती है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस देह रूपी यंत्र से हम सभी प्रकार के सुखोपभोग और आनंद प्राप्त कर सकते हैं । किंतु हम आत्मनियंत्रण न रखने के कारण हमेशा दुखी रहते हैं। मन द्वारा संचालित यह देह बुद्धि की नही सुनता और इसीलिए भले-बुरे का बोध नहीं रखता।अस्तु किसान के डंडे के रूप में विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों और विकारों से पीड़ित होता है। यह देह हमें ईश्वर प्राप्ति के हेतु मिली है। इसीलिए बुद्धिमत्ता और संयम की अत्यंत आवश्यकता है।
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