बढ़त-बढ़त संपत्ति-सलिलु, मन-सरोज बढ़ि जाइ/Badhat-badhat sampatti-salilu, man-saroj badhi jai

बिहारी

बढ़त-बढ़त संपत्ति-सलिलु, मन-सरोज बढ़ि जाइ।
घटत-घटत सु न फिरि घटे, बरु समूल कुम्हिलाइ॥

सरल अर्थ

जिस प्रकार जल बढ़ने पर कमल भी ऊपर उठता जाता है, उसी प्रकार धन-संपत्ति बढ़ने पर मनुष्य का मन और इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। लेकिन जब संपत्ति घटने लगती है, तब मन की इच्छाएँ उतनी जल्दी कम नहीं होतीं। परिणामस्वरूप मनुष्य दुखी होकर पूरी तरह टूट जाता है।

भावार्थ

कवि बिहारी ने मनुष्य के स्वभाव का गहरा मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। कवि बिहारी कहते हैं कि जब मनुष्य का संपत्ति रूपी जल बढ़ता है, तो उसका मन रूपी कमल भी बढ़ जाता है अर्थात जैसे-जैसे मनुष्य के पास धन बढ़ने लगता हैं, वैसे-वैसे ही उसकी इच्छाएं भी बढ़ने लगती हैं, परंतु जब संपत्ति रूपी जल घटने लगता है, ठीक वैसे ही जैसे कमल-नाल पानी घटने पर घटकर अपने पुराने रूप में नहीं आती, बल्कि जड़ सहित मुरझा ही जाती हैं।

दूसरे शब्दों में, समृद्धि के साथ मनुष्य की आकांक्षाएँ और विलासिता भी बढ़ती जाती हैं, लेकिन जब धन कम हो जाता है तो भी इच्छाएँ बनी रहती हैं। यही असंतुलन व्यक्ति के दुःख और मानसिक कष्ट का कारण बनता है।

काव्य-सौंदर्य

1. भाव-सौंदर्य

इस दोहे में कवि ने धन और मनुष्य की इच्छाओं के संबंध को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने बताया है कि संपत्ति बढ़ने के साथ इच्छाएँ भी बढ़ती हैं, परंतु संपत्ति घटने पर इच्छाएँ नहीं घटतीं। यही स्थिति मनुष्य के दुःख और पतन का कारण बनती है। दोहे में जीवन का गहन मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक सत्य व्यक्त हुआ है।

2. शिल्प-सौंदर्य

  • भाषा: साहित्यिक एवं परिमार्जित ब्रजभाषा।
  • शैली: दोहा शैली, सूक्तिपूर्ण एवं नीतिपरक।
  • अलंकार:
    • दृष्टांत अलंकार – संपत्ति और मन की इच्छाओं की तुलना जल और कमल के उदाहरण से की गई है।
    • रूपक अलंकार– संपत्ति-सलिलु और मन-सरोज में रूपक अलंकार है।
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार – “बढ़त-बढ़त” तथा “घटत-घटत” शब्दों की पुनरावृत्ति।
    • अनुप्रास अलंकार – “बढ़त-बढ़त”, “घटत-घटत” में समान वर्णों की आवृत्ति।
  • रस: शांत रस (नीतिपरक भाव प्रमुख)।
  • छंद: दोहा।

3. भाषा एवं शब्द-चयन

कवि ने सरल, सरस और प्रभावशाली ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। “संपत्ति-सलिल” (धन = जल) और “मन-सरोज” (मन = कमल) जैसे प्रतीकों के माध्यम से गूढ़ जीवन-दर्शन को सहज रूप में प्रस्तुत किया गया है।

4. संदेश

यह दोहा सिखाता है कि मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। धन-संपत्ति नश्वर है, इसलिए जीवन में संतोष और संयम का भाव बनाए रखना ही वास्तविक सुख का आधार है।

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