बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।/Baithi rahi ati saghan ban,paithi sadan tan mahi
बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौं चाहति छाँह॥
सरल अर्थ
जेठ मास की दोपहर इतनी प्रचंड गर्म है कि घने जंगल की छाया भी स्वयं छाया की तलाश करती हुई घर के भीतर चली गई है। अर्थात् गर्मी इतनी अधिक है कि बाहर कहीं भी शीतलता नहीं बची।
भावार्थ
कवि ने जेठ की भीषण गर्मी का अत्यंत सजीव और कल्पनापूर्ण चित्रण किया है। उन्होंने कल्पना की है कि वृक्षों की छाया भी धूप से बचने के लिए घरों के भीतर चली गई है। इससे गर्मी की तीव्रता का प्रभावशाली चित्र सामने आता है।
काव्य-सौंदर्य
1. भाव-सौंदर्य
कवि ने जेठ मास की असहनीय गर्मी का अत्यंत सजीव एवं कल्पनाशील चित्रण किया है। छाया का स्वयं छाया खोजने जाना एक अद्भुत कल्पना है, जो गर्मी की तीव्रता को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है।
2. शिल्प-सौंदर्य
- भाषा: साहित्यिक एवं परिमार्जित ब्रजभाषा।
- शैली: दोहा शैली, चित्रात्मक एवं कल्पनापूर्ण।
- अलंकार:
- मानवीकरण अलंकार – छाया को मनुष्य की भाँति घर में प्रवेश करते और छाया चाहने वाला बताया गया है।
- पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार – “छाँहौं चाहति छाँह” में “छाँह” शब्द की पुनरावृत्ति से सौंदर्य उत्पन्न हुआ है।
- अनुप्रास अलंकार – “छाँहौं–चाहति–छाँह” में ‘छ’ ध्वनि की आवृत्ति।
- रस: शांत रस।
- छंद: दोहा।
3. भाषा एवं शब्द-चयन
बिहारी ने सरल, मधुर एवं चित्रात्मक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। कम शब्दों में जेठ की भीषण गर्मी का सजीव दृश्य उपस्थित कर दिया है।
4. संदेश
यह दोहा कवि की अद्भुत कल्पनाशक्ति और प्रकृति-चित्रण की क्षमता को दर्शाता है। अतिशय गर्मी का चित्र प्रस्तुत करते हुए कवि ने प्रकृति के माध्यम से भावों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति की है।
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