
गणेश स्तुति
गणपति हमारे सनातनी समाज के मुख्य देव और प्रथम पूजनीय देव हैं । उनके आशीर्वाद से समस्त विघ्न दूर हो जाते हैं और मनुष्य की मेधा प्रखर होती है। गणेश पंच देवों में भी हैं और साक्षात भगवान हैं । वे , बल , बुद्धि , विद्या , विभिन्न कलाएँ और मोक्षदायक हैं । इसलिए यहाँ पर भक्तों की सुविधा हेतु भगवान गणेश की प्रार्थना करने के लिए सरल और दैनिक प्रार्थना में प्रयोग किए जाने वाले श्लोक दिए गए हैं और उनके अर्थ भी प्रस्तुत हैं ।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देवे सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
वक्र अर्थात टेढ़े मुख वाले , विशाल काय और करोड़ो सूर्य के समान आभायुक्त हे देव (गणेश) आप सदैव मेरे सभी कार्यों को निर्विघ्न करें ।
गजाननं भूत गणादि सेवितं,
कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकम्,
नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥
हाथी के समान मुँह वाले , भूत -गण आदि से सेवित , कैथ और जामुन फल प्रेम से खाने वाले , शोक का नाश करने वाले तथा विघ्न हरने वाले हे उमासुत आपके चरण कमलों को मैं प्रणाम करता/करती हूँ ।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ
अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और समस्त मंगल करने वाली सरस्वतीजी और गणेशजी की मैं वंदना करता हूँ
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
जो श्वेत वस्त्र धाराण किए हैं , चन्द्र के समान जिनका श्वेत रंग है , वे प्रसन्न वदन हैं ,ऐसे समस्त विघ्नों का नाश करने वाले चतुर्भुज देव का मैं ध्यान करता हूँ ।
स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम्।
वासरमणि तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम् ॥
उन सिन्धुरवदन देव गणेश की सदा जय हो ! जिनके चरन कमलों के स्मरण मात्र से ही समस्त विघ्न उसी प्रकार नष्ट हो जाते है , जिस प्रकार सूर्य अंधकार राशियों का नाश कर देते हैं ।



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