
Hindiflorets
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दोस्तो! हर कोई प्रसन्न रहना चाहता है। लेकिन फ़िर भी कोई खुश नहीं दिखाई देता। ऐसा क्या कारण है कि लोग चाहते हुए भी प्रसन्न नहीं रह पाते। हर किसी को कुछ न कुछ समस्या है । लोग हमेशा खुश रहना चाहते हुए भी हमेशा दुखी क्यों रहते हैं ? प्रसन्न रहने का क्या सरल उपाय है? आज की चर्चा का विषय यही है। लेकिन इसके पहले आपके लिए एक छोटी-सी कहानी प्रस्तुत है।
किसी जंगल में एक छोटी-सी चिड़िया रहती थी। चिड़िया जहाँ चाहती, वहाँ उड़ती। वह हमेशा प्रसन्न रहती । उसे किसी बात की कोई चिंता न थी। एक दिन चिड़िया को एक छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा मिला। चिड़िया ने उस कपड़े से एक छोटी-सी पोटली बना ली और अपने पैर में बाँध ली। अब चिड़िया तो जंगल भर में उड़ती फ़िरती और अनेक पशु-पक्षियों से मिलती। उसे रोज़ अनेक खट्टे-मीठे अनुभव होते। चिड़िया को जब भी कोई बुरा अनुभव होता तो वह एक छोटा-सा कंकड़ उस पोटली में डाल देती।
इस तरह जल्दी ही चिड़िया की पोटली में कई कंकड़ इकट्ठा हो गए। पोटली थोड़ा भारी हो गई। चिड़िया के लिए उड़ना आसान न रहा। अब वह ऊँचा न उड़ पाती और थोड़ा नीचे ही उड़ती। किंतु चिड़िया ने हर बुरे अनुभव के लिए पोटली पर कंकड़ डालना जारी रखा। जल्दी ही चिड़िया की पोटली और भारी हो गई । अब चिड़िया उड़ नहीं पाती। वह फ़ुदकती हुई इधर-उधर घूमती। चिड़िया अपनी हालत से दुखी थी पर फ़िर भी चिड़िया ने अपनी पोटली पर कंकड़ इकट्ठे करना जारी रखा। थोड़े दिनों बाद यह हालत हो गई कि चिड़िया का चलना-फ़िरना ही बंद हो गया।
साथियों ! हम सब भी इस चिड़िया की भाँति हैं जो अपने जीवन के अच्छे पलों को तो भूल जाते हैं और बुरे अवसरों को, बुरी बातों को याद रखते हैं। हम सबने अपने -अपने दिमाग में चिड़िया की पोटली की तरह की ऐसी ही अनेक ग्रंथियाँ बना रखी हैं, जिनका बोझा लिए हम हमेशा घूमते रहते हैं । मान-अपमान, ईर्ष्या, द्वेष , जलन , बदले की भावना, दूसरे को नीचा दिखाने की इच्छा, घमंड आदि की अनेक पोटलियाँ हमने अपने दिमाग में इकट्ठा कर ली हैं , इसी कारण आज आम आदमी के जीवन में इतना तनाव और अवसाद है। हम चिंताओं से ग्रस्त हैं। यही अवसाद आगे चलकर हमारे शरीर और मस्तिष्क में विकार लाता है और अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ इसी का परिणाम हैं लेकिन फ़िर भी हम इन पोटलियों से छुटकारा नहीं पाना चाहते।
यह बात याद रखनी चाहिए कि जितना अधिक हम अपने बुरे अनुभवों को याद रखते हैं उतना ही कचरा हम अपनी बुद्धि में जमा कर रहे हैं । आवश्यकता है सफ़ाई की। तो गहरी साँस लीजिए और स्वयं से कहें-” मैंने अब इन सारी बुरी स्मृतियों को मुक्त किया। अब मैं अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिये तैयार हूँ।” जैसे ही आप अपने मस्तिष्क को इन कड़वे अनुभवों के बोझ से मुक्त करेंगे, आप अपने-आप को पहले जैसा ही प्रसन्न और स्फूर्तिवान पायेंगे। अब आप ऊँची उड़ान भरने के लिये तैयार हैं । मित्रों ! यह बात याद रखिए, जब आप किसी को उसके बुरे व्यवहार के लिए दिल से माफ़ कर रहे होते हैं तो वास्तव में आप स्वयं को उन ग्रंथियों से मुक्त करते हैं जो आगे चलकर आपकी प्रगति में बाधा बन सकती हैं । दूसरे के बुरे कर्मों का फल उन्हें विधाता समय आने पर देता ही है। इसीलिए सब बोझ अपने दिमाग में मत डालिए। स्वयं को किसी भी दुर्भावना से मुक्त रखें और आगे बढ़ें। प्रसन्न रहने का यही एकमात्र उपाय है।



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