अनुच्छेद 1

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” सूक्ति का अर्थ यह है कि अपनी मातृभाषा के बिना किसी समाज या व्यक्ति की समग्र उन्नति संभव नहीं है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, सभ्यता, और विचारधारा का संवाहक होती है। मातृभाषा में शिक्षा न केवल ज्ञान के प्रसार को सुगम बनाती है, बल्कि सृजनात्मकता और आत्म-अभिव्यक्ति को भी प्रोत्साहित करती है। जब व्यक्ति अपनी भाषा में सोचता और सीखता है, तो वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है और उसके अंदर एक आत्मीयता का बोध जागृत होता है।

मातृभाषा का विकास राष्ट्र की समृद्धि का प्रतीक है। यह संस्कृति को संरक्षित रखती है और पीढ़ियों को जोड़ने का काम करती है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने से व्यक्ति को न केवल आत्म-विश्वास मिलता है, बल्कि उसके मानसिक विकास में भी तेजी आती है। दूसरी भाषाओं का ज्ञान होना आवश्यक है, लेकिन मातृभाषा की महत्ता को अनदेखा करना आत्म-संवर्धन से विमुख होना है।हिंदी जैसी भाषाओं का अध्ययन और प्रयोग भारतीय समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक तंतुओं को जोड़ने का कार्य करती है। इस विचार को महाकवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी बल दिया था। उन्होंने अपने लेखन में इसी भाव को प्रकट करते हुए लिखा-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

किसी भी समाज और राष्ट्र की उन्नति का मूल स्रोत उसकी भाषा में निहित है। यदि हम अपनी भाषा को समृद्ध करते हैं, तो हमारी सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान का भंडार भी समृद्ध होगा।

अनुच्छेद 2

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” महाकवि भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की सुप्रसिद्ध कविता की इस पंक्ति का अर्थ यह है कि किसी भी व्यक्ति या समाज की वास्तविक उन्नति उसकी मातृभाषा में ही निहित है। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में एक विदेशी भाषा के प्रचार से दुःखी होकर उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा देने के लिये प्रेरित करते हुए यह कविता लिखी थी। ।अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना न केवल आसान होता है, बल्कि यह हमारे मानसिक विकास और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है।

प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्ति के मातृभाषा में न केवल सोचना और समझना आसान होता है अपितु अपने भावों और विचारों का संप्रेषण करना, अपने विचारों को व्यक्त करना भी स्वाभाविक रूप से होता है, क्योंकि वह भाषा उसकी प्राकृतिक समझ का हिस्सा होती है।अपनी भाषा में शिक्षा लेना आत्म-समृद्धि का प्रमुख आधार है। यह व्यक्ति को उसकी संस्कृति और परंपराओं से जोड़कर रखती है, और उसे अपनी जड़ों से कभी अलग नहीं होने देती। जब हम अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो हमें अपने विचार स्पष्ट रूप से प्रकट करने की स्वतंत्रता मिलती है, और हम सृजनात्मक रूप से अधिक सक्षम होते हैं।

मातृभाषा हमारे आत्मविश्वास और स्वाभिमान को बढ़ाती है और व्यक्ति अपने समाज और संस्कृति के प्रति गौरव महसूस करता है । यह अनुभूति किसी विदेशी भाषा के द्वारा कभी नहीं पाई जा सकती । अतः भाषा का महत्त्व केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की प्रगति में अहम भूमिका निभाती है। आज ग्लोबलाइजेशन के दौर में यद्यपि विदेशी भाषाओं ,विशेषकर अंग्रेजी की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता, किंतु हिंदी भाषा का प्रचार, प्रसार और प्रगति न केवल भारत देश की प्रगति के लिए आवश्यक है अपितु हम सबका अनिवार्य कर्तव्य भी है।

मातृभाषा में शिक्षा से सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता दोनों को बल मिलता है। कोई समाज अपनी भाषा के द्वारा अपनी संस्कृति और ज्ञान को सहेजते हुए प्रगति के उच्चतम शिखर को छू सकता है।

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