रक्षाबंधन और भद्रा
“मुझे आज तक समझ में नहीं आया आज से 20-25 साल पहले कहाँ थी यह भद्रा? सोशल मीडिया के इस दौर में रक्षा बंधन के त्योहार को कुछ घंटों तक ही सीमित कर दिया है। हम तो बचपन में सुबह उठकर नहा- धो कर पंडित जी हम सबको राखी पहनाते थे हम सभी भाईयों को राखी बांधते थे ।” कहती हैं देहरादून में रहने वाली सीमा बिष्ट।
इसी तरह आगरा की कमलेश कहती हैं कि मेरी बहू का मायका मथुरा में है है । वह पति के साथ मायके गई है , रक्षा बंधन मनाने। अब शाम को आगरा भी आना है क्योंकि उसकी ननदें वहीं हैं ऐसे में त्योहार कैसे मनाएँ?
जब भी रक्षा बंधन का त्योहार आता है , साथ में ज्योतिष भद्रा के बारे बता कर मुहुर्त निकाल देते हैं ।पहले की तरह सुबह उठ कर राखी बाँधने का प्रचलन कम हो रहा है। तो जानते हैं कि आखिर यह भद्रा है क्या बला?

भद्रा क्या है और पंचांग में इसकी स्थिति
भद्रा भारतीय पंचांग के अनुसार एक विशेष समय होता है जिसे अशुभ माना जाता है। यह समय एक विशेष देवी “भद्रा” का होता है, जो सूर्य देव और छाया देवी (संवर्तकनी) की पुत्री मानी जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भद्रा का स्वभाव उग्र और तामसिक होता है, और इसी कारण इसे अशुभ समय के रूप में देखा जाता है।
भद्रा काल में किसी भी शुभ कार्य को करने से बचना चाहिए, विशेष रूप से वैवाहिक और धार्मिक कार्यों से। यदि भद्रा काल में कोई शुभ कार्य किया जाता है, तो इसके अशुभ परिणाम होने का भय रहता है। इसलिए, रक्षाबंधन के दौरान भी भद्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है।
रक्षाबंधन और भद्रा का समय
रक्षाबंधन का पर्व श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, और इस दिन का मुहूर्त यानी शुभ समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि रक्षाबंधन के दिन भद्रा का काल है, तो उस समय राखी बांधने से बचना चाहिए। माना जाता है कि भद्रा के समय शुभ कार्य का उचित फल नहीं प्राप्त होता।
यहाँ एक बात ध्यान रखने की है कि रक्षाबंधन मूलतः श्रावणी पर्व है है जिसमें जनेऊ धारण करने वाले द्विज अपनी पुरानी जनेऊ बदल कर नई जनेऊ धारण करते हैं । रक्षा -बंधन पौराणिक या वैदिक पर्व न होकर लोकपर्व है। इसमें मूलतः कुलपुरोहित या आचार्य द्वारा रक्षा-सूत्र या कलावा बाँधा जाता है । इसीलिए किसी कारणवश अथवा समयाभाव में यदि भद्राकाल में ही रक्षा-बाँधनी पड़े तो मन में संकोच न लायें। पूरे प्रेम -विश्वास और श्रद्धा से ईश्वर के पवित्र नामों को स्मरण करते हुए भाई को रक्षा-सूत्र बाँध कर भाई की दीर्घायु की कामना की जा सकती है।
भद्रा से बचाव का उपाय
भद्रा के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए आवश्यक है कि राखी बांधने का समय पंचांग के अनुसार तय किया जाए। आमतौर पर, भद्रा काल समाप्त होने के बाद या उससे पहले का समय शुभ माना जाता है। यदि भद्रा का समय दिन के अधिकांश हिस्से में हो, तो रात में या भद्रा समाप्त होने के बाद ही राखी बांधनी चाहिए।
संतुलन ही एकमात्र उपाय
भद्रा का संबंध धर्म और ज्योतिष से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसीलिए रक्षा-बंधन के अवसर भी भद्रा काल का निर्णय किया जाता है। पहले संचार माध्यम इतने सशक्त नही थे तो निश्चित समय का पता नहीं चल पाता था लेकिन किसी भी शुभ कार्य को करने में भद्रा से बचने की परंपरा हमें हमारे पुराणों और धार्मिक मान्यताओं से प्राप्त हुई है। इसलिए, रक्षाबंधन के समय भद्रा का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, ताकि इस पवित्र पर्व का पूरा लाभ मिल सके और भाई-बहन के रिश्ते में हमेशा प्रेम और विश्वास बना रहे।
इसके अलावा, आजकल अधिकाँश लोग कहीं न कहीं नौकरी आदि सेवाओं में दूसरे के अधीन और बाध्य हैं। समयाभाव में इन सब मान्यताओं का पूरी तरह पालन करना असंभव प्रतीत हो रहा है। ऐसे में यदि भद्रा का समय अपरिहार्य हो और किसी कारणवश उस समय ही राखी बांधनी पड़े, तो पूजा और राखी बांधते समय भगवान की विशेष पूजा और मंत्रों का जाप किया जा सकता है ताकि भद्रा का प्रभाव कम हो सके। ज्योतिष और लोकपर्व एवं विभिन्न मान्यताओं में संतुलन बनाकर रखना ही एकमात्र उपाय है।




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