अमरत्व
सदियों से मानव सभ्यता अमरत्व पाने का प्रयास करती आईं हैं। आर्ष ग्रंथों में दीर्घ जीवन का उद्देश्य ही तप, आराधना और नाम संकीर्तन बताया गया है यही ईश्वर प्राप्ति और अमरता का मार्ग है। प्रस्तुत कविता इसी ओर इशारा कर रही है।
अमरत्व
देख मन फ़िर से समझाता हूं
न हो चंचल, विकल, व्यथित
सारहीन जगत, कहीं ठान्ह नहीं।
मौन हो भीतर अपने ही झांक
संकुचित सिकोड़ संसार से स्वयं को
खोज रहा सुख मरीचिका, वह बाहर नहीं।
दीन दयालु हरि की चरण शरण ले
वह अमृत वर्षा अपने ही अंतःकरण में
प्राप्त कर अमरत्व जो जगत में कहीं नहीं।
मौलिक रचना: कुसुम लता जोशी




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