एक भारतीय का गौरव : मजबूत परिवार
हर समाज के अपने तौर -तरीके और परंपराएँ होती हैं जिनमें वे गर्व करते हैं और उसे आगे अपनी पीढ़ियों को देना चाहते हैं ।एक भारतीय के रूप में अपनी सनातनी संस्कृति का हिस्सा होने के नाते मैं भी गर्व और गौरव का अनुभव करती हूँ।हमारे पास विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति है और हम इसके वारिस हैं।हमारे पास अपने पूर्वजों के द्वारा दिया गया अपूर्व ज्ञान का भंडार वेद हैं । जब विश्व की मानव सभ्यता विकास की ओर उन्मुख थी तब ही हमारे पूर्वजों ने वेद, पुराण, स्मृति लिख दिए थे।जब बाकी विश्व की सभ्यता कपड़े पहनना ही सीख रही थी तब हमारे पूर्वजों ने आयुर्वेद, ज्योतिष , नाट्य़ आदि विशद अध्ययन कर इनमें शास्त्र लिख दिए थे।

भारत की संस्कृति असंख्य परंपराओं, भाषाओं, व्यंजनों और मान्यताओं से सजा गुलदस्ता है। यह देश के प्राचीन इतिहास और अपनी जड़ों को संरक्षित करते हुए परिवर्तन को अपनाने की क्षमता का गौरवपूर्ण प्रमाण है। दिवाली और होली के जीवंत उत्सवों से लेकर योग और ध्यान की शांत प्रथाओं तक, भारत की सांस्कृतिक विरासत इसके लोगों के लिए गर्व का स्रोत है। इसकी कला, संगीत, नृत्य और साहित्य ने विश्व पर अमिट छाप छोड़ी है। भारत की समावेशी संस्कृति विविधता में एकता सिखाती है, जिससे हमें इस उल्लेखनीय राष्ट्र का हिस्सा होने पर गर्व होता है, जहां परंपरा और प्रगति सामंजस्यपूर्ण रूप से सह-अस्तित्व में है।
इसलिए गर्व करने के लिए तो हमारे पास बहुत है , किंतु आज के परिप्रेक्ष्य में मैं जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण समझती हूँ , वह है हमारा मजबूत पारिवारिक आधार। भारतीय परंपरा की यह मजबूत कड़ी है। जिसमें भाई-भाई, भाई-बहन, माता-पिता , पिता-पुत्र, पति-पत्नी, चाचा-चाची, मामा-मामी आदि सभी रिश्तों के बीच आज भी गहरा रिश्ता है। हमारा पारिवारिक आधार इतना मज़बूत है कि कोई भी मुसीबत को हम एक दूसरे के सहारे बड़ी आसानी से पार कर जाते हैं। जहाँ विश्व भर में पति- पत्नी आपसी संबंध स्थाई बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं आज भी भारतीय समाज में जीवन के बाद भी पत-पत्नी के स्थाई संबंध होने की मान्यता है। इन्हीं दृढ़ और मज़बूत पारिवारिक स्थितियों में जब बच्चे बड़े होते हैं तो उनकी भी मानसिक स्थिरता अच्छी होती है और वे भी बड़े होकर अपने परिवार, मित्रों और समाज का स्थाई आधार बनते हैं ।
इसीलिए मैं समझती हूँ कि परिवार की यह मज़बूती ही वह सबसे बडी और महत्त्वपूर्ण परंपरा है जिसमें हम सब भारतीयों को गौरव महसूस करना चाहिए। इसी पारिवारिक एकता के विशालतम रूप को देखते हुए हमारे पूर्वजों ने “वसुधैव कुटुंबकम” का नारा दिया था। इसी “वसुधैव कुटुंबकम” का उद्घोष आज भी भारत कर रहा है। वस्तुत: संपूर्ण विश्व ही अपना परिवार हो और उसमें हर व्यक्ति स्वस्थ, सुरक्षित और सुख का अनुभव करे। यही मेरी कामना है। यही सबसे महत्त्वपूर्ण है। विश्व में हर प्राणी के उत्कर्ष की कामना के साथ! हरीक्षा!



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