कालरात्रि देवी: अकाल मृत्युहर्ता
नवरात्रि के सातवें दिन भगवती दुर्गा (पार्वती) के कालरात्रि रूप की पुजा की जाती है। इन्हें माँ काली के नाम से भी जाना जाता है।कालरात्रि का नाम “काल” और “रात्रि” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है “काल की रात”। भगवती दुर्गा दुष्टों, पापियों और अधर्मियों के लिए काल की रात्रि के समान ही हैं। वे महायोगिनी, महामाया और महायोगेश्वरी भी कहलाती हैं । वे भक्तों के कष्ट हर उन्हें बुरी शक्तियों के नकारात्मक प्रभाव से बचाती हैं। वे प्रसन्न होने पर भक्तों का शुभ करती हैं इसीलिए उनका एक नाम शुभंकरी भी है। तंत्र साधना में कालरात्रि देवी की साधना का विशेष महत्त्व है।

कालरात्रि देवी की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी महिषासुर से युद्ध करने गई , तब उसने उनके अपूर्व रूप को देख कर अपने दो सेनापति चंड-मुंड भेजे। तब उन्होंने देवी को बलपूर्वक महिषासुर के पास ले जाने का प्रयत्न किया। इसीलिए देवी ने क्रोध में यह अघोर रूप ढारण किया। वे उन पापियों के लिए काल की रात्रि बन गई और कालरात्रि या काली कहलाईं।
एक अन्य मत के अनुसार , सात दिन तक साधना के प्रभाव से साधक का शरीर कमजोर पड़ जाता है। इस वक्त उसे मानसिक रूप से सश्क्त होकर देवी की आराधना करनी होती होती है । सातवाँ दिन साधक के लिए कठोर परीक्षा का दिन होता है। जहाँ आत्मबल और तपबल पर सधक भीतर की नकारात्मक शक्तियों को हरा कर शुद्ध निर्मल हो आठवें दिन की साधना के लिए तैयार होता है। एक तरह से यह नकारात्मक शक्तियों पर शुद्ध और सात्विक शक्तियों की विजय का प्रतीक है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, देवी कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं अर्थात इनकी पूजा से शनि के दुष्प्रभाव दूर होते हैं।इस दिन साधक को ‘सहस्त्रार चक्र’ में ध्यान स्थिर चाहिए।

कालरात्रि का स्वरूप
कालरात्रि को काली माँ की अद्वितीय रूप माना जाता है। वे काले मेघ समान श्याम वर्ण की अथवा अँधकार का रंग लिए हुए हैं। उनके बाल बिखरे हुए हैं। श्वांस लेते समय उनके नथुनों से अग्नि प्रकट हो रही है। गले में पड़ी मुंडमाला विद्युत के समान चमक रही है। उनके चार हाथ हैं जिनमें वे खड्ग और त्रिशूल धारण किए हुए हैं\ उनका एक हाथ भक्तों के भय को दूर करने हेतु अभय मुद्र में है और अन्य एक हाथ वरमुद्रा लिए हुए है। वे दुष्टों और पापियों का नाश करने को उद्द्यत दिखाई पड़ती हैं। । वे काला वस्त्र धारण करती हैं ।कालरात्रि का वाहन गर्दभ है। आयुर्वेद के अनुसार , नागदौन नामक एक औषधि , जोकि ग्वारपाठे के समान है उसे कालरात्रि का स्वरूप माना जाता है। तंत्र-मंत्र के साधकों की यह अधिष्ठात्री देवी हैं ।
कालरात्रि की पूजा का फल
कालरात्रि की पूजा में भक्त उनके समक्ष दीपक जलाते हैं, मंत्र जपते हैं, और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। वे अन्याय और अधर्म के खिलाफ खड़ी होती हैं और अपने भक्तों को सुरक्षित रखती हैं। देवी की भक्ति का फल अमोघ है । शीघ्र प्रसन्न होने वाली देवी बड़ी ही संतोषी हैं और अपने भक्त के ऊपर आई समस्त बाधाओं , विपादाओं को अपने ख्ड्ग से काट डालती हैं और भक्त की अकाल मृत्यु जैसी विपदाओं से रक्षा करती हैं। देवी मानसिक और शारीरिक व्याधियों का नाश करने वाली, रोग नाशक , और संकट हारिणी हैं। अपना कल्या चाहने वाले हर साधक को देवी का आशीर्वाद अवश्य लेना चाहिए। जपकुसुम या गुड़हल के फूल देवी को अत्यंत प्रिय हैं।
कालरात्रि देवी को प्रणाम करने का मंत्र
ऊँ कालरात्रि देव्यै नम:।
या देवी सर्व भूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनम:॥
कालरात्रि देवी की स्तुति करने का मंत्र
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता,
लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा,
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥




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