मित्रो! हम देखते हैं कि सभी धार्मिक मतों में ईश्वर के नाम जप की बड़ी महिमा कही गई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने, संत-महात्माओं ने और सभी धार्मिक ग्रंथों में नाम जप की महिमा कही गई है। इसी लिए साधक दिन-रात नाम जप करते रहते हैं । कलियुग में तो नाम-जप ही मुख्य माना गया है। फ़िर भी कई बार साधकों के मन में संशय उठता है :
“क्या भगवान के नाम-जप से सच में भगवान मिल जाते हैं?”

मित्रो! हम देखते हैं कि सभी धार्मिक मतों में ईश्वर के नाम जप की बड़ी महिमा कही गई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने, संत-महात्माओं ने और सभी धार्मिक ग्रंथों में नाम जप की महिमा कही गई है। इसी लिए साधक दिन-रात नाम जप करते रहते हैं । कलियुग में तो नाम-जप ही मुख्य माना गया है। फ़िर भी कई बार साधकों के मन में संशय उठता है :
“क्या भगवान के नाम-जप से सच में भगवान मिल जाते हैं?”
साधको! इसी बारे में पहले एक कहानी सुनते हैं। एक बार की बात है, अकबर बीरबल के साथ शाम के समय अपने बाग में टहल रहे थे तभी उन्होंने कुछ लोगों के सामूहिक नाम जप की आवाजें सुनी। अकबर ने बीरबल से कहा ,”बीरबल तुम्हारे धर्म में ये लोग जो हर समय इस तरह जाप करते रहते हैं ,मुझे नहीं लगता कि इस तरह भगवान इनकी आवाज सुन पाते हैं । ये लोग सिर्फ़ समय बरबाद कर रहे हैं।
अकबर की बात सुनकर बीरबल मौन रहे।
कुछ दिनों बाद एक सुबह अकबर के महल के बाहर एक भिखारी आ बैठा । भिखारी बड़े कातर स्वर में चिल्लाने लगा,”अकबर, अकबर ।” दरबान ने देखा तो परेशान हो गया। उसने भिखारी को भगाने की कोशिश की।लेकिन भिखारी टस से मस न हुआ। दरबान परेशान । भला कैसा लगेगा बादशाह के महल के आगे भिखारी? दरबान ने महल में खबर भिजवाई। रानियों ने थोड़ा खाने का सामान और एक गिन्नी भिखारी को भिजवा दी। भिखारी ने इन सब की तरफ़ मुँह उठाकर भी न देखा और लगातार चिल्लाता रहा, “अकबर, अकबर ।”अब तो बड़ी समस्या हुई। अकबर तक भिखारी की खबर पहुँची।
अकबर ने सोचा कि शायद इस भिखारी को कुछ ज्यादा धन चाहिए। उसने अपने नौकर के हाथ एक पोटली भर गिन्नियाँ भिजवाई। पर भिखारी भी गजब ही था। उसने गिन्नियों की ओर नज़र भी न घुमाई और लगातार चिल्लाता रहा,”अकबर,अकबर।” अकबर को सब हाल सुनाया गया। अकबर ने अपने मंत्री को भेजा और आदेश दिया, “जाकर पता करो कि भिखारी को क्या चाहिए। उसे जो भी चाहिए, देकर रफ़ा-दफ़ा करो। अकबर के महल के सामने इस तरह भिखारी चिल्लाए, यह अच्छी बात नहीं। “
मंत्री ने अनेक तरह से भिखारी से जानने की कोशिश की कि आखिर भिखारी इस तरह अकबर के नाम की टेर क्यों लगा रहा है? आखिर भिखारी को चाहिए क्या?” मगर भिखारी ने कोई जवाब नहीं दिया और पहले की तरह ही “अकबर,अकबर” चिल्लाता रहा। हारकर मंत्री वापस अकबर के पास गया और उसे सारा हाल कह सुनाया। अकबर परेशान ! इतना बड़ा बादशाह और एक भिखारी को संतुष्ट न कर सका? यह तो बड़ी बदनामी वाली बात हो जाएगी। जनता क्या कहेगी? इस भिखारी को न धन चाहिए और न अनाज! यह सिर्फ़ अकबर को पुकार रहा। अकबर के मन में यह भी जानने की इच्छा हो गई कि आखिर भिखारी चाहता क्या है? अकबर इस विशेष भिखारी को देखने के लिए उत्सुक हो गया।
अकबर उस भिखारी से मिलने पहुँचा। देखा भिखारी अभी भी अकबर नाम का जाप कर रहा। अकबर ने भिखारी से मिला और उसकी समस्या पूछी। इसी समय बीरबल वहाँ आ गया। उसने अकबर से कहा,”बादशाह ! जब एक राजा भिखारी के चिल्लाने पर महल के दरवाजे पर आ गया। तो भला अपने भक्त के पुकारने पर भक्त वाँछा तरु भगवान भक्त को क्यों नहीं मिलेंगे? अकबर को बात समझ में आ गई।
साथियों! इस कहानी से साबित होता है कि भगवान का नाम जपने से ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होती है।
नाम जप से सिद्धि के अनेक उदाहरण हैं। आधुनिक युग में भी सूर, तुलसी, कबीर, दादू, नानक, रैदास, पीपा, सुन्दरदास आदि संतों तथा मीराबाई, सहजोबाई जैसी साधिकाओं ने इसी जपयोग की साधना करके संपूर्ण संसार को आत्मकल्याण का संदेश दिया है और ईश्वर की प्राप्ति की है। नाम की महिमा अगाध है।
तुलसी दास जी कहते हैं :
” तुलसी अपने राम को, रीझ भजो या खीज।
भूमि पड़े जामे सभी, उल्टा सीधा बीज॥
भगवान कृष्ण ने भी जप की महिमा बताते हुए सभी यज्ञों में‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि” कहकर जप को श्रेष्ठ बताया है।
सत्वशुद्धिकरं नाम, नाम ज्ञानप्रदं स्मृतम्।
मुमुक्षाणां मुक्तिप्रदं कामिनां सर्वकामदम्।।
naamaamrut
हरि का नाम मनुष्यों की शुद्धि करने वाला, ज्ञान प्रदान करने वाला, मुमुक्षुओं को मुक्ति देने वाला और इच्छुकों की सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
संत तुलसीदास कहते है,
“कलयुग केवल नाम अधारा, सिमर-सिमर नर उतरहिं पारा”
अर्थात कलियुग में केवल भगवान के नाम का जाप ही मनुष्य को संसार के गहरे समुद्र से पार लगाने के लिए पर्याप्त है।
कलियुग में नाम संकीर्तन के अलावा जीव के उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है|
बृहन्नार्दीय पुराण में आता है–
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं|
कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा||
कलियुग में केवल हरिनाम, हरिनाम और हरिनाम से ही उद्धार हो सकता है| हरिनाम के अलावा कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है! नहीं है! नहीं है!
भगवन्नाम-जप के प्रभाव से नारद देवर्षि बन गये और भगवान का निरंतर दर्शन करने के अधिकारी हो गए। भगवन्नाम-जप के प्रभाव से ही कीड़े में से मैत्रेय ऋषि बन गये। परंतु भगवन्नाम की महिमा मात्र इतनी ही नहीं अपितु अपरिमित है।भगवान के नाम से सिद्धि अवश्य ही होती है अतः इसमें किसी प्रकार का कोई संशय नहीं होना चाहिए।
श्रुति भी कहती है
“जपेत सिद्धि,जपेत सिद्धि,जपेत सिद्धिर्नसंशय:।”



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