छाप तिलक सब छीनी रे……..” क्या कृष्ण भक्ति गीत है ?
छाप तिलक सब छीनी रे………… एक मधुर गीत , जिसके बोल सरल बोल चाल की भाषा में लिखे गए हैं ,भारतीय जनमानस को बहुत पसंद आता रहा है । संगीत के क्षेत्र में इस गीत का गायन अपना विशिष्ट स्थान रखता है । इस गीत के बारे में कुछ चर्चा करें , इस से पहले हम इस गीत के बोल जान लेते हैं ।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के।
अपनी छवि बनाइ के जो मैं पी के पास गई,
जब छवि देखी पीय की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के
बात अधम कह दीन्हीं रे मोसे नैना मिलाइ के।
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग-रजवाँ
अपनी सी रंग दीन्हीं रे मोसे नैना मिलाइ के।
प्रेम बटी का मधुवा पिलाय के
मतवारी कर दीन्हीं रे मोसे नैना मिलाइ के।
गोरी-गोरी बहियाँ हरी – हरी चुड़ियाँ
बहियाँ पकड़ हर लीन्हीं रे मोसे नैना मिलाइ के।
खुसरो निजाम के बल-बल जाए
मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिलाइ के।
बात अज़ब कर दीनी रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के॥
यह वस्तुत: एक गज़ल है । इसके रचयिता अमीर खुसरो हैं जो कि चौदहवीं सदी के महान सूफ़ी फ़कीर माने जाते रहे हैं । बहुधा इस गज़ल का गायन कव्वाली के रूप में होता है । इस गज़ल के गायकों में अनेक प्रसिद्ध गायकों की लम्बी फ़ेहरिश्त है । नुसरत फ़तेह अली खान , अबिदा बेगम , इकबाल हुसैन बन्दानवाज़ी , राहत फ़तेह अली खाँ, सबरी ब्रदर्स आदि आदि ।
भारत में भी इस गज़ल को बहुदा गाया जाता रहा है । सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर जी ने भी इसे अपना स्वर प्रदान किया है । इसके अतिरिक्त अक्सर विभिन्न गायकों के द्वारा अनेकों मंचों पर इसे गाया गया है । लोग इसके गायन को रूहानी मानते है ।
भारत में इस गज़ल का विशेष महत्त्व है । लोग यदि इसे सूफ़ी गीत माने तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता, पर भारत में अक्सर इस गज़ल को कृष्ण भक्ति गीत समझ लिया जाता है । कई प्रसिद्ध कथाकार अपने व्यास पीठ से इसे गाते रहे हैं । इसमें हित अंबरीश जी , सुश्रि जया किशोरी जी, देवी चित्रलेखा जी, श्रीमान विनोद अग्रवाल जी जैसे लोग शामिल हैं ।
प्रश्न यह उठता है कि क्या इस गज़ल को जिसके बोल “छाप तिलक सब छीनी रे……” हैं ,कृष्ण भक्ति गीत या भक्ति गीत मान सकते है ? यदि नहीं , तो क्यों नहीं?
सबसे पहली बात यह है कि अमीर खुसरो एक सूफ़ी फ़कीर थे । उन्होंने अपने गुरु और मार्गदर्शक की प्रशंसा करते हुए यह गज़ल लिखी है । उनके गुरु निजामुद्दीन औलिया थे । जिनके नाम का जिक्र इस गजल में भी उन्होंने किया है “खुसरो निजाम के बल बल जाए” । कृष्ण नाम या इस प्रकार के भाव का यहाँ कोई स्थान ही नहीं है ।
ऐसा क्या कारण है जो हिंदू जनता के भीतर इस प्रकार का भ्रम पैदा करता है? इसमें प्रयुक्त हुए शब्दों छाप ,तिलक से कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं कि यह कृष्ण भक्ति गीत है । यह गीत ब्रज भाषा में लिखा गया है जिसके कारण यह सरल और लोक भाषा से जुड़ा हुआ लगता है ।
सच्चाई तो यह है कि उस समय जब यह गज़ल लिखी गई तब भारत में कृष्ण और राम भक्ति का खासा प्रचार हो रहा था । भारत का जनमानस उस समय के महान संतों के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हो दृढ़तापूर्वक धर्म निष्ठता का प्रदर्शन कर रहा था । साहित्य की दृष्टि से इसे ही भक्ति काल (1375 से 1700 ई0 तक ) कहा जाता है । तुलसीदास , सूरदास , रैदास जैसे महान भक्त कवि अपनी कविताओं में लोक भाषा का प्रयोग कर जन मानस को ईश्वर से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे थे ।
इसी काल में सूफ़ी वाद भी भारत में अपने पैर पसार रहा था । सूफ़ी फ़कीर प्रेम और उपदेश के द्वारा इस्लाम का प्रचार करने में विश्वास करते थे । निजाउद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरों भी यही करने का प्रयत्न कर रहे थे । इसीलिए उस काल में विभिन्न लोक भाषाओं में इस प्रकार के गीत लिखे और गाए गए, जो लोगों को इन फ़कीरों की ओर आकर्षित करें । उन्होंने इसे लोक भाषा में लिखा। इन गीतों की मधुर धुन , भारतीय पद्धति से गायन और इस्लाम की कट्टर विचारधारा के विपरीत विभिन्न स्थानीय वाद्ययंत्रों के प्रयोग ने इन गीतों को शीघ्र ही जनमानस की जुबान पर चढ़ा दिया। उस काल में सिर्फ़ ब्रजभाषा में ही नहीं अनेक अन्य लोक भाषाओं में इस प्रकार के सूफ़ी गीत लिखे गए, जिनमें पंजाबी, उर्दू, अवधी, बांग्ला, गुजराती, भोजपुरी ,राजस्थानी आदि अनेक भारतीय भाषाओं में लिखे गए। दमादर मस्त कलंदर, काली कमली वाले आदि अनेक गीत सूफ़ी गीत ही हैं।
छाप-तिलक सनातन धर्म की प्रथम पहचान है । आदि शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म को मुख्यत: पाँच भागों में बाँटा है: गाणपत्य, शाक्त ,शैव , वैष्णव और सौर्य । इन सभी सम्प्रदायों के भीतर भी उप सम्प्रदाय हैं । किंतु सबका एक बात पर एकमत है – तिलक । भारतीय संस्कृति में तिलक विहीन माथा शुभ नहीं माना जाता । तिलकविहीन मस्तक देखना भी अशुभ ही समझा जाता था । इसी कारण लंबे प्रयास और ताड़ना के बाद भी भारतीय जनता अपना तिलक और चोटी नहीं छोड़ना चाहती थी । तिलक से व्यक्ति के सम्प्रदाय और उप सम्प्रदाय आदि का भी स्वत: परिचय हो जाता है । आज भी आप तिलक देख कर पता कर सकते हैं कि व्यक्ति किस देव की पूजा -पद्धति का अनुपालन करता है ।
ऐसे समय में , कुछ लोगों ने संभवत: इन सूफ़ी फ़कीरों की संगत में आ कर अपने नियम और तिलक आदि की मर्यादा का त्याग कर दिया था । उन्हीं को लक्ष्य कर अमीर खुसरो ने अन्य लोगों को भी प्रेरित करने के लिए इस प्रकार का गज़ल लिखा ।
लोकभाषा और लोक संगीत के नजदीक यह गीत “छाप तिलक सब छीनी…. “भी जल्दी ही लोगों की पसंद का गीत बन गया। और लोग इसे कृष्ण भक्ति से जोड़कर देखने लगे। लेकिन वस्तुत: ये इस्लाम इस गज़ल के प्रथम बोल ही पढ़िए … । इस गीत की प्रथम पंक्ति से ही पता चलता है कि इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सनातन धर्म से दूर ले जाना है क्योंकि छाप तिलक सनातन धर्म की पहचान और गौरव है। छाप तिलक छीन लेने का अर्थ उस गौरव से हीन होना और अपनी मूल पहचान को खो देना है।
जब भक्ति काल अपने चरम में था और लोग बड़े- बड़े तिलक धारण कर रहे थे । तब कुछ लोगों का तिलक त्याग बड़ी उपलब्धि था । आश्चर्य की बात यह है कि आज हमारे धर्म प्रचारक इस गज़ल को बड़े नाच- नाच कर अपने मंचों से प्रसारित कर रहे हैं । अपने यू-ट्यूब चैनल में प्रसारित कर रहे हैं । तिलक और छाप हमारी पहचान और धर्म का अटूट हिस्सा है । कृष्ण और राम के उपासक आज भी अपने सम्प्रदायानुसार कट्टरता से तिलक धारण करते हैं । तिलक के बिना हमारा कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं हो सकता । तब छाप, तिलक सब छीनी रे … गज़ल किस प्रकार हमारे धर्म और संस्कृति को बढ़ावा दे रही है ? अथवा कृष्ण /राम भक्ति का संदेश हो सकती है ?
आज भी दक्षिण भारत में घर से बाहर निकलते समय तिलक लगाने की और घर में आए मेहमान को जाते समय तिलक ,पान पत्र, सुपारी आदि निवेदित करने की परंपरा देखी जा सकती है ।
अत: सभी से निवेदन है कि यह स्पष्ट रूप से समझ लें कि यह सूफ़ी गीत भगवान कृष्ण से संबंधित नहीं है और अपने निकट मित्रों को भी इस अंतर को स्पष्ट करें।
यहाँ पर इस आलेख को लिखने का उद्देश्य यह नहीं किसी गीत अथवा पद्धति का विरोध करना कदापि नहीं है। यह आलेख सिर्फ़ भ्रम निवारण के लिए लिखा गया है , क्योंकि मात्र ब्रज भाषा की समानता के कारण कई अति ज्ञानी लोग भी इस विषय में भ्रमित हो जाते हैं । वस्तुतः यह गीत सूफ़ी पद्धति द्वारा इस्लाम के प्रचार हेतु लिखा गया है।








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