मारा मारी मची है
मचा बड़ा अंधेर
मुँह मियां मिट्ठू बनकर
दादुर देता टेर
सौ के चक्कर में पड़ा सिर,
निन्यानब्बे का फेर
कोई चाहे धन दौलत
मुद्रा ढेरम ढेर
लालच से अंधे हो कर
करते हेर फेर
सौ के चक्कर में पड़ा सिर,
निन्यानब्बे का फेर
किसे चाहिए सुख चैन यहाँ
किसे चाहिए देर
उल्टा पुल्टा काम करें सभी
हो जाए न अबेर
सौ के चक्कर में पड़ा सिर,
निन्यानब्बे का फेर.
घर का कुकुर बांवरा
बना गली का शेर
जनता पर झूठी धौंस जमा
नेता बना कुबेर
सौ के चक्कर में पड़ा सिर,
निन्यानब्बे का फेर
खुद को ही बांटे रेवड़ी
कंचन बरसे मेह
पाटल के दिन गुजर गए
राजा भए कनेर
सौ के चक्कर में पड़ा सिर,
निन्यानब्बे का फेर
मौलिक रचना: कवयित्री कुसुम लता जोशी



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