रांगेय राघव: हिंदी साहित्य का खरा सोना

रांगेय राघव

रांगेय राघव किसी परिचय के मोहताज नहीं। मेरे प्रिय लेखकों की फेहरिस्त में जो लेखक आते हैं उनमें  रांगेय राघव अग्रणी है। यद्यपि  रांगेय राघव जी की रचनाओं की समीक्षा करने की योग्यता तो मुझ में नहीं है किंतु १७ जनवरी १९२३ को  उनकी जन्म शताब्दी  पर लिखने का लोभ सँवरण नहीं कर पा रही हुँ। रांगेय राघव की आधुनिक हिंदी भाषा  जिसमें शब्दों का स्वाभाविक प्रवाह है जिसके कारण वे मेरे प्रिय लेखक बन गए। लेखक की रचनाओं को पढ़ते हुए पाठक उनकी रचनाओं में इस तरह डूब जाता है कि समय का खयाल ही नहीं रहता। यही विशेषता किसी लेखक को प्रसिद्ध करने के लिए काफ़ी है।

यह तो मुझे बहुत बाद में पता चला कि रांगेय राघव जी के पूर्वज दक्षिणात्य थे तथा तिरुपति बालाजी देवस्थानम से संबंधित थे। हालांकि, कुछ  पीढ़ियों पहले उनके पूर्वज भरतपुर के बैर ,व्रज क्षैत्र में आकर बस गए थे जहां कि वे राजपुरोहित के रुप में कार्यरत रहे। राघव जी की माता कनकवल्ली कन्नड़ भाषी और पिता रंगाचार्य तमिल ब्राह्मण थे। इसी पारिवारिक पृष्ठ भूमि के कारण उन्हें संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त था। रांगेय राघव जी का जन्म स्थान आगरा था जो कि हिंदी और ब्रज भाषा का गढ़ है।  बैर क्षेत्र भी उत्तर प्रदेश और राजस्थान का सीमांत क्षेत्र होने से रांगेय राघव जी को हिन्दी, ब्रज भाषा और राजस्थानी भाषा को पढ़ने,सुनने और समझने का अच्छा अवसर मिला । इसी का परिणाम है कि उनकी कई कहानियाँ इसी क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर आधारित है और यहां के लोक जीवन का बारीक विश्लेषण स्वाभाविक रुप से उभर आया है जो कहानी को एक मजबूती प्रदान कर स्थान विशेष से जोड़ देता है।

 साहित्य की वह कौन सी विधा है जिसमें रांगेय राघव जी ने लेखनी न चलाई हो! निबंध, नाटक रिपोर्ताज, कहानियां , कविताएं, उपन्यास, आलोचना आदि सभी उनके द्वारा लिखे गए। तेरह वर्ष की अल्पायु से ही वे लिखने लगे थे और फिर हर क्षेत्र में लिखते ही रहे। उन्होंने १०० से भी अधिक कहानियां लिखी , जिनमें कहीं सामाजिक जागरूकता और चेतना के दर्शन होते हैं  तो कहीं  राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक शोषण  का चित्रण। हालांकि उनकी कहानियां जनमानस के बीच की ही थी किंतु भाषा प्रवाह , जटिलता रहित लेखन और गठे हुए कथा सौष्ठव के कारण उनकी कहानियां  पाठक को जकड़ कर रख लेती है और कहानी खत्म होने के बाद भी दिलों-दिमाग में कुछ समय तक  प्रभाव बनाए रखती है। भाषा का सरल सहज प्रवाह, कहीं-कहीं चित्रात्मक शैली और कभी संवाद तो कही प्रकृति का स्वाभाविक वर्णन, कई बार तो गद्य में ही उनके कवि हृदय का भी परिचय  होने लगता है।

घरौंदा राघव जी के प्रारंभिक उपन्यासों में से है जिसमें एक निर्धन परिवार का गांव का भोला-भाला लडका विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए शहर आ जाता है। शहरी जीवन का संघर्ष ,छात्रावास, महाविद्यालय की शिक्षा आदि विविधताओं के साथ ही अंग्रेजी  साम्राज्य, द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ही साथ मिशनरियों द्वारा धर्म परिर्वतन कराने की समस्या को भी दर्शाया  गया है।  हालांकि यह लेखक के प्रारंभिक उपन्यासों में से एक है इसीलिए कहीं-कहीं कथा में उतनी परिपक्वता नहीं दिखती। कहीं लेखक जीवन के साधारण से अवसर पर दार्शनिक हो विचार व्यक्त करने लगते हैं तो कहीं पर पढ़े-लिखे नए जमाने के युवाओं में पुरानी रूढ़ियों को तोड़ आगे बढने की कसक भी दिखती है। कई जगह पर कॉलेज के कुछ ऐसे दृश्य बन पड़े हैं जो आज के युवा वर्ग को भी अपने से जुड़े हुए लगते है। इसीलिए कुल मिला कर घरौंदा एक रोचक उपन्यास बन गया और आज भी  सामायिक है। 

पाठक के रुप में रांगेय राघव जी को सबसे पहले मैने “कब तक पुकारूँ” नामक उपन्यास में पढ़ा था । रांगेय राघव जी की यह कालजयी रचना बैर क्षेत्र के आदिवासी  करनट समुदाय से हैं। इसी में कंजर,लुहार आदि तबके का भी थोडा परिचय मिलता है । भूमिका में ही लेखक रांगेय राघव जी ने करनट समुदाय के बारे में जानकारी प्रस्तुत की है जिससे इस समुदाय की रीतियों से अनभिज्ञ  पाठक   इस समाज की स्त्रियों के खुले यौन संबंधों, वैश्या वृत्ति आदि की परंपरा देख कर भौचक्का न रह जाएं। कहानी का नायक  सुखराम और उसके पूर्वज  नट समाज में रहने के बावजूद ठाकुर होने के दोहरे चरित्र को जीते हुए , मान-अपमान और थोथे अभिमान से जूझते हुए  दिखते हैं। वहीं ’गदल’  भी इनकी  आंचलिक कहानी है  जिसमे समाज के  निचले हिस्से के जीवन शैली , समस्याएं , परंपराएं आदि दिखाई देती है । ’गदल’ स्त्री का  स्वैच्छिक  जीवन तो दिखाती है किंतु साथ ही परिवार, परम्परा, प्रेम के लिए समर्पण और आत्मोत्सर्ग भी दिखाती है।  एक मायने में देखें तो  यह कहानी भी “कब तक पुकारू” उपन्यास का ही एक चरित्र दिखती है नायिका  गदल जो कि लुहार समाज के कम आयु के युवक के घर बैठ जाती है ।  “कब तक पुकारू” उपन्यास पर बाद मे एक टेलीविजन श्रंखला भी बनी, जिसे काफ़ी लोकप्रियता मिली। ’मुर्दों का टीला ’ उनका दूसरा बहुचर्चित उपन्यास रहा, जो मोहन-जोदड़ो सभ्यता और संस्कृति पर आधारित है। १९४२ में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा पर आधारित रिपोर्ताज ’तूफानों के बीच’ भी लोगों द्वारा बहुत पसन्द किया गया। 

 रांगेय राघव जी के लेखन की एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने स्त्री हृदय को केंद्र में रख कर लेखन किया है । इसीलिए उनकी कहानियां नायिका के हृदय में झांकती प्रतीत होती हैं। वे सीधे कृष्ण न कह कर “देवकी का बेटा” कहते हैं। यशोधरा के त्याग को प्रकट कर उसे बुद्ध के सामने विजयी होते दिखाते हैं। यहां तक कि “कब तक पुकारूँ” कहानी के स्त्री पात्रों के चरित्र दिखाने से पहले ही स्पष्ट करते हैं कि वेश्यावृत्ति, या परपुरूष संबंध वहां घिनौने कृत्य न हो कर, उस समाज में मान्य परंपरा  और कभी-कभी मजबूरी भी हैं। 

 रांगेय राघव जी के अन्य अनेक उपन्यास भी है जो जीवनी आधारित है । जिनमे भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की जीवनी पर आधारित ’भारती का सपू”, कृष्ण जीवन पर ’देवकी का बेटा’ भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित ’यशोधरा जीत गई’ कवि बिहारी पर ’मेरी भव बाधा हरो’ आदि  हैं । इन्होंने कई  ललित निबंध भी लिखे , जो काफी सराहे गए। 

’पिघलते पत्थर’ ,’श्यामला’, ’अजेय’  , ’खंडहर’ , ’मेधावी’ ,’राह के दीपक’, ’पांचाली’ और ’रूपछाया’ रांगेय राघव जी  कविता संग्रह हैं। ’श्रमिक’ कविता में जहाँ खेतिहर श्रमिक की मधुर भावना को

“हम शस्य उगाने आए थे,छाया करते नीले-नीले।

झुक झूम-झूम हम चूम उठे, पृथ्वी के गालों को गीले।“

कह कर उकेरा है तो ’डायन सरकार’ कविता में परतंत्रता से खीजते हुए युवाकवि हृदय ने ’परदेशी का राज न हो, बस यही एक हुंकार रहे। फ़िर उठा तलवार।’ कहकर ब्रिटिश सरकार के प्रति विद्रोह दर्शाया है। वहीं जिंदगी की जंग से थके हुए मन की पीड़ा व्यक्त करते हुए ’नास्तिक’ कविता में कवि जहाँ परमसत्ता से ही प्रश्न करने लगता है- ”ओ ज्योतिर्मय! क्यों फ़ेंका है, मुझको इस संसार में” तो वहीं दूसरी तरफ़ ’ मैं चिर जीवन का प्रतीक हूँ!” कहकर सकारात्मकता का घोष भी करते दिखते हैं । इस प्रकार उनकी कविताओं में जीवन के विविध यथार्थ रंग तो मिलते हैं साथ ही सकारत्मकता भी दिखती है, जो कवि के जीवन-दर्शन को प्रकट करती है। जहाँ वे जीवन के संघर्ष और पीड़ा को जिजीविषा और उत्साह के साथ भरते हुए दिखते हैं। इससे प्रकट होता है कि वे समाज को पीड़ा, निराशा के गर्त से उभारकर आगे बढ़ने को उत्साहित करना चाहते थे। उनकी कविता में मार्क्सवादी प्रभाव तो है किंतु रूढ़िवादिता से हटकर उन्होंने नवचेतना जाग्रत करने की कोशिश की। इसी कारण उनका साहित्य मानव समाज के लिए कल्याणकारी हो सका।    

रांगेय राघवजी की प्रसिद्धि और लोकप्रियता के कारण ही उनके द्वारा लिखी कृतियों का अनेक विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। जैसा कि तत्कालीन समय में विदेशी रचनाओं का हिंदी में  बड़ी संख्या में अनुवाद हो रहा था, रांगेय राघव जी ने भी ओथेलो, जूलियस सीजर, तिल का ताड़, मैकबैथ  आदि अनेक विदेशी लेखकों की मूल रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया।

माना जाता है कि अपने अनवरत लेखन के परिणाम  स्वरूप ही वे  हिंदी साहित्य के ऐसे लेखक के रुप में सामने आए, जिन्हें पूरी तरह से मसिजीवी कहा गया। अर्थात वे पूर्ण रुप से लेखन द्वारा जीवन यापन कर पाने में सक्षम हो सके। उनसे पहले चाहें प्रेमचंद हो निराला, महादेवी हों या  हरिवंश राय बच्चन! आजीविका के लिए उन्हें अन्य जगह तीन पांच करनी ही पड़ी थीं । 

रांगेय राघव  की रचनाओं में समाज के वास्तविक चरित्र का चित्रण किया गया है। अनावश्यक आदर्शवादिता से हट कर समाज का असली चेहरा अपनी रचनाओं में लेखक ने प्रकट कर दिया है।  कहानी की पृष्ठ भूमि चाहें  ’गदल’, ’नई जिंदगी के लिए’ की तरह उत्तर भारतीय हो या ’देवदासी’  और ’प्रवासी ’ की तरह दक्षिण भारतीय , अथवा अन्य, प्रेमचंद की तरह के अनावश्यक आदर्शवाद  उन्होने अपने पात्रों में नहीं थोपे। समाज की घृणित, दूषित और रूढ़िवादी परंपराओं , भ्रष्टाचार, स्त्रियों के प्रति अत्याचार और पुरूष प्रधान विचारधारा (’नई जिंदगी के लिए” में बेटे के जन्म की कामना )को सामने लाए और उसकी निरर्थकता को उजागर किया। उनकी कहानियों को पढ़कर लगता है कि मानो अपनी रचनाओं के माध्यम से वे समाज को उसका असली मुखौटा दिखा कर परिवर्तन लाना चाहते थे और यहीं कारण है कि आज भी उनकी रचनाएं उतनी ही सामायिक लगती हैं। शायद इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य का शेक्सपीयर भी कहा जाता है।

 रांगेय राघव जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । उनको न केवल हिंदी भाषा पर पूर्ण अधिकार था अपितु वे अंग्रेजी, संस्कृत, राजस्थानी , तमिल, तेलुगु आदि के भी अच्छे जानकार थे । संगीत और गायन का भी ज्ञान रखते थे और अच्छे गायक भी थे। उनकी नज्मों में शामिल उर्दू के अल्फाजों से उनके उर्दू भाषा के ज्ञान का पता चलता है। उनकी रचनाओं में दिखने वाली मौलिकता, भाषा-शैली, और विभिन्न ज्वाजल्यमान विषयों में लेखनी उठा पाने की क्षमता रांगेय राघव जी को खरा सोना साबित करती हैं। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति की शायद ईश्वर को भी जरूरत थी। इसीलिए लगभग उनतालीस वर्ष (१९२३ से १९६२तक) की अल्पायु में ही वे परम धाम सिधार गए। फिर भी अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य का यह सूर्य सदैव दैदीप्यमान  रहेगा।

समीक्षक: कुसुम लता जोशी 

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