सोशल मीडिया द्वारा अभद्र भाषा का प्रचार माध्यम

सोशल मीडिया आज जहां लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, वहीं कुछ लोग इस स्वतंत्रता का गलत उपयोग करते हुए अभद्र भाषा और अशोभनीय टिप्पणियों का प्रचार कर रहे हैं। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग बिना सोच-विचार के गाली-गलौच, कटु भाषण, तथा अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं, जिससे दूसरों की भावनाएं आहत होती हैं और समाज में नफरत और तनाव फैलता है। विशेष रूप से राजनैतिक, धार्मिक या सामाजिक मुद्दों पर लोग भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं।

सोशल मीडिया में प्रयोग की गई भाषा आपके व्यक्तित्व का परिचायक है।

यह प्रवृत्ति न केवल मानसिक तनाव बढ़ाती है, बल्कि युवाओं और बच्चों पर भी बुरा प्रभाव डालती है। सोशल मीडिया कंपनियाँ इस पर नियंत्रण के लिए नियम तो बना रही हैं, लेकिन तब तक हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम भाषा की गरिमा बनाए रखें और शालीनता से संवाद करें। यदि सोशल मीडिया का उपयोग शिष्ट और सकारात्मक भाषा में किया जाए, तो यह समाज में सद्भाव और समझ को बढ़ावा दे सकता है।

सोशल मीडिया: गालियों की नया विश्वविद्यालय

आजकल सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक अभद्र भाषा विश्वविद्यालय बन चुका है — जहाँ कोई डिग्री नहीं चाहिए, सिर्फ एक की-बोर्ड और थोड़ा गुस्सा! लोग अब विचार नहीं रखते, बस तर्कहीन तड़क-भड़क वाले शब्द रखते हैं। फेसबुक पर एक मामूली पोस्ट डाल दो, तो टिप्पणी में गालियों की बरसात ऐसी होती है जैसे मानसून ने ग़लत लोकेशन पर बादल बरसा दिए हों।

ट्विटर पर तो हाल और भी गंभीर है। वहाँ तो लगता है हर तीसरा यूज़र गाली देने में PhD किए बैठा है। कोई मुद्दा छोटा हो या बड़ा — कुछ लोग तो ऐसे आते हैं जैसे उनकी जिंदगी का मकसद ही टिप्पणी में आग लगाना हो। लगता है मानो उन्होंने बचपन में संस्कार की घुट्टी नहीं, बल्कि “गाली शब्दकोश” पढ़कर बड़े होने की कसम खाई हो।

अब तो बच्चों को ABCD सिखाने से पहले ये सिखाना पड़ेगा कि “Online बोलो, Offline मत बोलो”, यह भी डर लगता कि वे कहीं अवांछित जगह भी कुछ न बक दें । कहीं स्कूल में मास्टरजी को भी “बे” से बेवकूफ बोल दिया तो घरवाले ही सोशल मीडिया से निकाल देंगे!

संसकारों की तो इस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं कि अंग्रेज़ी भाषा के अनेक अपशब्द भारतीय लोगों की रोज़मर्रा की बातचीत में घुस आए हैं। पता ही नहीं चलता कि किस साधारण सी बात पर कोई फ़@%$!” जैसे शब्द न बोल दे।

कभी सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब लोग घर बैठे-बैठे दुनिया बदल देंगे—न विचारों से, न कार्यों से, बल्कि गालियों से। जी हाँ, आपका परिचित, प्यारा सोशल मीडिया अब सिर्फ पोस्ट, फोटो और लाइक्स का नहीं, बल्कि “डिजिटल दुर्व्यवहार” का सबसे सशक्त मंच बन चुका है।

जहाँ पहले गालियाँ ‘गली’ में दी जाती थीं, अब वे WiFi और 4G स्पीड पर दौड़ती हैं। पहले “बोलने से पहले सोचो” जैसी बातें पढ़ाई जाती थीं, अब लगता है किसी ने पाठ्यक्रम से वो पंक्तियाँ डिलीट कर दी हैं ।

की-बोर्ड के पीछे के शेर

सोशल मीडिया ने हर आम इंसान को एक “कीबोर्ड योद्धा” बना दिया है। अब कोई भी इंसान, जिसने ज़िन्दगी में एक कॉमा सही जगह पर न लगाया हो, वही अब दूसरों के व्याकरण, धर्म, राजनीति और यहां तक कि उनके चेहरे के आकार पर भी ज्ञान परोसता है।

एक छोटा सा उदाहरण लीजिए। आपने लिखा,

“आज मौसम बहुत अच्छा है।”

बस! अब आप तैयार हो जाइए:

  • एक वर्ग कहेगा: “अच्छा? मतलब तुम्हें बारिश पसंद नहीं है? पर्यावरण के दुश्मन हो तुम!”
  • दूसरा कहेगा: “तेरा धर्म क्या है जो तू मौसम को अच्छा कह रहा है? जरूर किसानो का दुश्मन देशद्रोही , पाकी होगा यह ”
  • और तीसरा वर्ग: “फेक न्यूज़ फैलाने वाले! अभी-अभी मौसम विभाग ने बारिश की चेतावनी दी है!”

लेकिन असली डिजिटल मसाला तब शुरू होता है जब टिप्पणियाँ सिर्फ मतभेद से नहीं, शब्दों की मारक गालीबाज़ी से भर जाती हैं। लगता है जैसे लोग ट्विटर या फेसबुक नहीं, गालियों का ओलंपिक खेल रहे हों।

“अभिव्यक्ति की आज़ादी” नामक ढाल

आर्टिकल 19 एक ऐसे विश्व के लिए काम कर रहा है जहां सभी लोग, हर जगह, अपनी अभिव्यक्ति को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें।

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत लिखित और मौखिक रूप से अपना मत प्रकट करने हेतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान किया गया है।
  • किंतु अभियक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष नहीं है इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन हैं।
  • भारत की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता पर खतरे की स्थिति में, वैदेशिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति में, न्यायालय की अवमानना की स्थिति में इस अधिकार को बाधित किया जा सकता है।
  • भारत के सभी नागरिकों को विचार करने, भाषण देने और अपने व अन्य व्यक्तियों के विचारों के प्रचार की स्वतंत्रता प्राप्त है।
  • प्रेस/पत्रकारिता भी विचारों के प्रचार का एक साधन ही है इसलिये अनुच्छेद 19 में प्रेस की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।

अब आप कहेंगे, “भई, हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है।” हाँ बिल्कुल है। आर्टिकल 19 सबको बोलने की आज़ादी देता है। लेकिन किस हद तक? अगर कोई आपके साधारण से कमेंट में आपको देशद्रोही, विधर्मी, जिहादी आदि बोले तो क्या यह आपको भला लगेगा? लेकिन आज बोलने की आजादी का अर्थ अभद्रता की चरम सीमा !

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अभद्रता की: नई परिभाषा

सोशल मीडिया के आने से हर हाथ में माइक और हर हाथ में कैमरा है। लेकिन लोगों ने संस्कार नाम की चीज सिर्फ़ आध्यात्मिक पुस्तकों के लिए रख छोड़ी है। बोलने की आज़ादी मिलते ही “फ्रीडम ऑफ स्पीच” को कब “फ्रीडम टू अब्यूज़” में बदल डाला , पता ही न चला। कुछ लोग तो इतने क्रिएटिव हैं कि हर मुद्दे पर कमेंट करने के लिए उनके पास एक “ready-to-copy” गाली-पैक होता है। भले ही विषय विज्ञान हो, या आध्यात्म , लेकिन टिप्पणी में “तुम जैसे जाहिलों की वजह से देश पीछे है” आना तय है।

राजनीति और गाली का गठबंधन

राजनीति के बिना सोशल मीडिया अधूरा है—और राजनीति बिना गाली के अधूरी।
एक पार्टी कहेगी, “हमने देश को बनाया।” दूसरी बोलेगी, “तुमने तो बर्बाद किया।”
और तीसरे व्यक्ति की टिप्पणी होगी:

“सब के सब चोर हैं, और तुम सब #@%$!”

गालियाँ यहाँ तर्क का स्थान ले चुकी हैं। बहस अब तथ्यों से नहीं, शब्दकोश के निचले हिस्से से चलती है।
लोकतंत्र का मंच अब गालियों का रंगमंच बन चुका है। नेता मंच से चिल्लाते हैं, और समर्थक कमेंट सेक्शन से। एक तरफ वोट माँगा जाता है, दूसरी ओर विरोधियों को ” चमचे” चाटुकार”, अंधभक्त”,“भाड़ में जाओ” आदि उपाधियां देकर सम्मानित किया जाता है।

“इंफ्लुएंसर” या “इंफ्लेमर”?

अब बात करते हैं सोशल मीडिया के “महान विचारकों”, उर्फ़ इंफ्लुएंसर्स की। ये वो लोग हैं जो दिन में तीन बार रील बनाते हैं, दो बार स्टोरी डालते हैं और हर चौथे दिन किसी से भिड़ जाते हैं।
अगर किसी ने उनकी बात का विरोध कर दिया, तो तुरंत लाइव आकर कहेंगे:

“दोस्तों, कुछ घटिया लोग हैं जो मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं।”

नीचा दिखाने का जवाब?
अरे भई, सीधा “तेरे जैसे $@#% लोग” वाला जवाब, फिर फॉलोवर्स का तालियों से स्वागत। कोई इन्हें रोकता है तो इन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन महसूस होता है।

बच्चों का डिजिटल संस्कार

पहले बच्चे स्कूल में श्लोक पढ़ते थे:

“सहनाववतु सहनाभुनक्तु …..”

लेकिन अब पढ़ते हैं:

“अबे तू! हट ना! चुप बे! ह$#% रामी ” आदि

यह तो होना ही है, क्योंकि जो बच्चे अपने माता-पिता को सोशल मीडिया पर लड़ते देख रहे हैं, जो क्लास छोड़कर YouTube की roast वीडियो देख रहे हैं—उनसे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे किसी की बात शांति से सुनें? फिर लोग कहते हैं कि नई पीढ़ी के पास संस्कार नहीं हैं लेकिन यह पीढ़ी इन्हीं अपशब्दों की सीढ़ियां चढ़ कर आगे बढ रही है।

यद्यपि इंटरनेट तो “ज्ञान का सागर” है, पर कुछ लोगों ने उसमें गालियों की अंधाधुंध गोलीबारी चला रखी है। सवाल यह है कि हम क्या स्वयं क्या कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं?

समस्या या समाधान?

सोशल मीडिया कंपनियाँ कहती हैं: “हम content मॉडरेट करते हैं।”
पर मॉडरेशन कोई प्रभावशाली नहीं है। लगभग सभी एप आपको सम्मानपूर्वक और सभ्यभाषा में संभाषण और कमेंट की चेतावनी देते हैं । लेकिन इन सभी की उचित स्क्रूटनी नहीं करते।

अगर किसी पर रोक भी लगाई जाती है तो वे दुबारा अकाउंट बना लेते हैं। गाली देने वाले ID बदलते हैं, फिर से लौट आते हैं। और जो शांति से बात करना चाहते हैं, वे या तो डरे रहते हैं या फिर ऐप ही uninstall कर देते हैं।

समस्या यह है कि जो सोशल मीडिया ज्ञान और मनोरंजन का अच्छा साधन हो सकता था वह सिर्फ़ अपशब्दों, गालियों और अश्लील मनोरंजन तक ही सीमित हो गया है।

अब समाधान क्या है?

यह समय आ गया है कि सिर्फ़ समस्या पर ही विचार न किया जाए अपितु यह भी सोचा जाय कि समस्या का समाधान किया जाए। क्योंकि आज समस्या छॊटी है तो निदान आसानी से संभव है ,किंतु कल जब यही भाषा माता-पिता, बंधु-बांधवों में कही जाएगी तो असहनीय होगी।

सोचिए — क्या गाली देने से हम बड़े बन जाते हैं? क्या विरोध का मतलब अपशब्दों की बौछार है?

क्या बिना दूसरे को अपमानित किए असहमति दिखाना असंभव है?

क्या यह संभव नहीं कि हम असहमति जताएँ, पर सम्मानजनक भाषा में?

सोशल मीडिया हमें जुड़ने का मौका देता है, लड़ने का नहीं। यह हमारी आवाज़ है, हथियार नहीं।

सोशल मीडिया वह समाज को जोड़ने का माध्यम है, तोड़ने और विभाजित करने का नहीं।

ध्यान रखेंसोशल मीडिया में प्रयोग की गई भाषा आपके व्यक्तित्व का परिचायक है।

निष्कर्ष रूपी थपकी (या तमाचा?)

ऐसे कई किस्से हुए हैं कि सोशल मीडिया की ट्रोलिंग से परेशान होकर कुछ लोगों ने आत्महत्या जैसे घातक कदम भी उठाए हैं। अगर यही ट्रेंड चलता रहा , तो कभी न कभी ऐसे हादसे हमारे घरों तक भी पहुंच सकते हैं। इससे पहले कि देर हो जाए , एक सभ्य समाज के जिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते हमें इस पर रोक लगानी चाहिए।

जैसे चाकू से सब्जी भी काटी जा सकती है और किसी को घायल भी किया जा सकता है, वैसे ही शब्दों से समाज जोड़ा भी जा सकता है और तोड़ा भी।

तो अगली बार जब कोई पोस्ट देखकर आपके अंदर का डिजिटल गुस्सैल शेर जागे, तो पहले सांस लीजिए, और सोचिए:

“मैं क्या कहने जा रहा हूँ — और क्या वह मेरी शिक्षा, संस्कार और इंसानियत को शोभा देता है?”

क्योंकि आख़िर में, लाइक्स और कमेंट्स चले जाएंगे, पर आपके शब्द, आपकी छवि बनाते हैं। इसलिए अगर आपको किसी पोस्ट से असहमति है, तो कृपया अनदेखा कर आगे बढ़िए। जरुरी नहीं कि आप हर पोस्ट पर प्रतिक्रिया दें। अगर आप किसी पोस्ट या सूचना पर प्रतिक्रिया नहीं भी देते हैं तो आपका कोई नुकसान नहीं होगा।

विडंबना ये है कि जो लोग “अभिव्यक्ति की आज़ादी” का झंडा उठाए घूमते हैं, वही सबसे पहले दूसरों की आवाज़ दबाने के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। शायद उन्हें लगता है कि जितनी ज़ोर से चिल्लाओ, उतनी बड़ी बात बन जाती है।

तो हे सोशल मीडिया वीरों! अगर आपके पास तर्क नहीं, तो कृपया कम से कम शब्दों की गरिमा तो बचा लें। वर्ना अगली पीढ़ी ये समझेगी कि “नेटवर्क” का मतलब सिर्फ नेट-गाली है। आपनी भाषा, बुद्धि और चेतना पर नियंत्रण रखते हुए एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सभ्य भाषा का प्रयोग करें ।

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