बस की यात्रा कक्षा 8 पाठ की व्याख्या, सार, प्रश्न-उत्तर

Class 8 Chapter 2 Bus ki Yatra Explanation,Summary, Question &Answers and Difficult word meaning

बस की यात्रा

बस की यात्रा पाठ की व्याख्या Bus ki Yatra Explanation

तय किया-fixed/ decided
हाज़िर होना- to attend
डाकिन- Female decoit; स्त्री दस्यु; प्रेतयोनि की स्त्री; चुड़ैल; पिशाचिनी

Difficult words :

श्रद्धा -faith reverence
वयोवृद्ध- elderly
वृद्धावस्था- old age, बुढ़ापा
हिस्सेदार- shareholder, partner

व्याख्या:

प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बस की जर्जर अवस्था को रोचक तरीके बताया और कहा कि बस इतनी अधिक पुरानी और बूढ़ी थी कि उसे देखकर श्रद्धा उमड़ पड़ी।इस बस ने कई वर्षों तक यात्रा की होगी इसलिए यह बस कई वर्षों के अनुभव के निशान थे। लोग बस के पुरानेपन के कारण इस बस से यात्रा नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था क्योंकि इस से बस को कष्ट होगा। यह बस पूजनीय थी अतः इस पर सवार नहीं हुआ जा सकता था।

जिस बस से लेखक अपनी यात्रा कर रहे थे, उसी बस से उस बस कंपनी के हिस्सेदार भी इसमें यात्रा कर रहे थे। लेखक को बस की खस्ता हालत को देखकर लग रहा था कि बस का चलना नामुमकिन है तो उन्होंने बस कंपनी के हिस्सेदार साहब से प्रश्न किया कि क्या यह बस चलती भी है? उन्होंने उत्तर दिया कि चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी।बस कंपनी के हिस्सेदार साहब को बस की योग्यता पर पूरा भरोसा था। लेखक और उसके मित्रों ने संदेह जताते हुए कहा कि – ‘‘वही तो हम देखना चाहते हैं कि यह कैसे चलेगी। अपने आप चलती है क्या यह?” हिस्सेदार ने लेखक की बात पर विश्वास जताते हुए कहा,” हाँ जी, और कैसे चलेगी?” इसपर लेखक को घोर आश्चर्य हुआ कि इतनी पुरानी बस चलती भी है।

Difficult words :

आगा-पीछा- hesitancy, back and forth,
विश्वसनीय- Reliable, भरोसेमंद
कूच करना – depart, विदा करना, रवाना होना,रवाना करना, चला जाना
निमित्त-बहाना करना.साधन , कारण, cause

व्याख्या: लेखक उस बस में बैठने से हिचक रहे थे इसलिए वे अपने मित्रों के साथ बस के आगे-पीछे होने लगेतब उनके डॉक्टर मित्र ने उन्हें समझाया कि घबराने की कोई बात नहीं है बस काफ़ी अनुभवी है इसलिए नई बसों से अधिक विश्वसनीय है। साथ ही यह पुरानी बस होने के कारण माँ की तरह यात्रियों को गोद में आराम से बैठा कर चलेगी।

इस बात पर लेखक और उनके मित्र बस में बैठ गए। उनको विदा कराने वाले इस प्रकार विदाई दे रहे मानो यह उनकी अंतिम यात्रा हो। हालाँकि मुँह से कोई कुछ नहीं कह रहा था किंतु उनकी आँखों के भाव मानो कह रहे थे कि दुनिया में लोगों का आना-जाना लगा ही रहता है । जो इस दुनिया में जन्मा है वह एक न एक दिन मरेगा ही, चाहे वह राजा हो या भिखारी या फ़िर कोई साधु-संन्यासी ही क्यों न हो।मृत्यु कोई न कोई बहाना या कारण ढूँढ कर आ जाती है,यहाँ बस ही वह माध्यम हो सकती थी।

Difficult words :

काँच- शीशा,glass
असहयोग – non-cooperation
सविनय अवज्ञा आंदोलन – civil disobedience movemen
भेद-भाव- पक्षपात, Discrimination

व्याख्या:

बस का इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया । इसके साथ ही इतना अधिक शोर और कंपन कर रहा था कि ऐसा लग रहा था मानो पूरी बस ही इंजन हो और यात्री बस की सीट में न बैठकर इंजन के भीतर बैठे हों। बस की खिड़कियों के सभी शीशे टूटे हुए थे जो बचे -खुचे शीशे थे उनसे यात्रियों को डर लग रहा था कि ये काँच कहीं टूट कर उन्हें न्लग जाएँ इसलिए लेखक तुरंत खिड़की से दूर हटकर बैठ गए। जब बस का इंजन चल रहा था तो उससे इतना अधिक कंपन बस में हो रहा था कि लेखक को महसूस हो रहा था मानो इंजन उनकी सीट के नीचे ही लगा हुआ हो।

बस सच में ही चल पड़ी। बस के पुराने और जीर्ण शीर्ण अवस्था को देखकर लेखक ने अनुमान लगाया कि 1930 में जब गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन या सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया था उस समय अवश्य ही यह बस जवान अर्थान नई रही होगीऔर इसीलिए उसे उस दौरान असहयोग करने की ट्रेनिंग मिल चुकी होगी। अब वक्त के साथ बस पुरानी हो चुकी थी , उसका हर हिस्सा बस के दूसरे हिस्से से असहयोग कर रहा था। बस का हर हिस्सा दूसरे भाग के आदेश का पालन नहीं कर रहा था। सीट और बॉडी के बीच ताल-मेल का इतना आभाव था कि कभी लगता कि सीट बस को छॊड़ कर आगे चली जाएगी तो कभी बस की बॉडी सीट को छॊड़ कर आगे बढ़ जाएगी। आठ-दस मील चलने पर बस के सभी हिस्सों का अंतर मिट-सा गया और लेखक को अंदाज ही नहीं रहा कि वे बस की सीट पर बैठे हुए थे या सीट ही यात्रियों पर बैठी हुई थी।

Difficult words :

एकाएक- अचानक, suddenly
गोद – lap
नली- pipe

व्याख्या:

अचानक बस रुक गई । बस की टंकी में छेद हो चुका था इसलिए ड्राइवर ने एक बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर अपनी सीट के पास रख लिया। और एक पाइप की सहायता से इंजन में पेट्रोल भेजने लगा। बस की ऐसी दशा को देखकर लेखक को लगा कि अब बस यही कसर बची है कि बस-कंपनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएँगे, जैसे माँ बच्चे के मुँह में दूध की शीशी लगाती है।

Difficult words :

रफ़्तार -Speed
गोता लगाना- to dive
लुभावना – मनमोहन, चित्ताकर्षक, मनोहर captivating

व्याख्या:

बस की हालत खस्ता थी। बस की गति मात्र पंद्रह-बीस मील हो गई थी।लेखक को बस के किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। किसी भी क्षण ब्रेक फेल हो सकता है या स्टीयरिंग टूट सकता है। आस-पास प्रकृति के दृश्य मनमोहक थे। दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे। लेकिन लेखक प्रकृति की सुंदरता का आनंद नही ले सका क्योंकि उसे डर था कि किसी भी क्षण इनमें से किसी भी पेड़ से बस टकरा जाएगी। लेखक हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। झील दिखने पर लेखक को डर लगता कि कहीं बस इसमें न डूब जाए!

Difficult words :

क्षीण चाँदनी- चाँद की मंदिम रोशनी ,चाँद की धुँधली रोशनी, weak moonlight
दयनीय – कारुणिक, pitiable
प्राणांत – मर जाना End of life
अंत्येष्टि- अंतिम संस्कार, दाह कर्म, funeral, last rites

व्याख्या:

अचानक फिर से बस रुकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं पर इस बार बस नहीं चली। बस के न चलने को लेखक ने सविनय अवज्ञा आंदोलन कह कर संबोधित किया। ऐसा इसलिए कि सविनय अवज्ञा आंदोलन में जिस प्रकार भारतीय़ अंग्रेजों की आज्ञा पालन नहीं कर रहे थे उसी तरह बस भी ड्राइवर बात नहीं मान रही थी। कंपनी के हिस्सेदार इसे महज़ एक संयोग मान रहे थे। उनके अनुसार बस में कोई कमी नहीं थी।चाँद की धुँधली रोशनी में बस बहुत लाचार और दयनीय स्थिति में लग रही थी मानो कोई बूढ़ी स्त्री थककर बैठ गई हो। लेखक को ग्लानि हो रही थी कि बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैंऔर अगर यह इस निर्जन जंगल में मर जाए तो इसका अंतिम संस्कार भी यात्रियों को ही करना पड़ेगा।

तभी हिस्सेदार साहब ने इंजन खोलाकर उसमें कुछ सुधार किया, जिससे बस आगे चलने लगी यद्यपि उसकी चाल और कम हो गई थी।

Difficult words :

ज्योति – रोशनी, चमक,Flame
टटोलकर – ढूँढती हुई, by groping
रेंगना – पेट के बल सरकना, creeping

व्याख्या:

धीरे-धीरे बस की लाइट्स बंद होने लगी जिसे लेखक ने वृद्धा के आँखॊं की रोशनी समाप्त होने से तुलना की ।अब बस सिर्फ़ चाँदनी में रास्ता अनुमान लगाकर रेंगती हुई सी चल रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और लेखक को लगता मानो बस अपनी जर्जर स्थिति का हवाला देते हुए दूसरी गाड़ी को आगे निकलने को कह रही हो।

Difficult words :

पुलिया – small bridge
हथेली – palm
दुर्लभ- विरला ,निराला, Rare
क्रांतिकारी- परिवर्तनकारी,Revolutionary
आंदोलन- अभियान , मुहिम, movement

व्याख्या: बस एक छोटे से पुल के ऊपर पहुँची ही थी कि एक टायर पंचर होकर बैठ गया। इससे बस एक बार जोर से हिली और रुक गई और सफर वहीं पर रूक गया। बस की गति इतनी कम थी कि किसी को चोट आदि नहीं लगी। अगर स्पीड ज्यादा होती बस नाले में उछ्ल कर गिर सकती थी। पहली बार लेखक ने कंपनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा के साथ देखा और सोचा कि वह टायरों की हालत जानते हैं फिर भी खतरा मोल ले रहे हैं। वह अपनी जान हथेली पर लेकर इस बस से सफर कर रहे हैं, ये तो हद ही हो गई। थोड़े से पैसे बचाने के लिए उसने टायर नहीं बदला। जान का जोखिम उठा कर भी वह टायर नहीं बदलवा रहा था इसीलिए लेखक ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। इस आदमी के साहस और बलिदान भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। लेखक उसको श्रद्धाभाव से उसकी देखते है और सोचते हैं कि इस आदमी को तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और सब मर जाते तो देवता बाँहें पसारे उसका स्वागत करते और कहते कि इस महान आदमी ने एक टायर के लिए प्राण दे दिए।

Difficult words :

घिसा टायर -worn out tire ,
प्रयाण कर जाना- प्रस्थान करना, मरना, to travel
बेताबी – विकलता, desperation
इत्मीनान- आराम से ,leisurely

व्याख्या:

बस का टायर बदला गया और उसकी जगह दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अबकी बार लेखक ने पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना क्या, कहीं भी, कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। सारी जिन्दगी इसी बस में गुजार जानी है प्राण भी शायद इसी बस के द्वारा ही निकल जाए ऐसा संभव था। अब लेखक को ऐसा लगने लगा था कि इस धरती पर उसकी कोई मंजिल नहीं है। आखिरी मंजिल यही बस थी पता नहीं ये कहाँ ले जाएगी। बस में बैठे हुए इतनी देर हो चुकी थी कि बस यात्रियों को लग रहा था कि पूरी जिंदगी इसी बस में गुजारनी है और इससे सीधे ही परलोक चले जाना है। इस पृथ्वी पर इस बस की कोई मंजिल नहीं है। ऐसा विचारते ही लेखक की सारी हमारी विकलता, तनाव, चिंता आदि खत्म हो गए। वे आराम से घर की तरह बैठ गए। सारी चिंता खत्म हो गई और यात्रियों के बीच हँसी-मजाक शुरु हो गया।

-हरिशंकर परसाई

प्रस्तुत पाठ में लेखक हरिशंकर परसाई ने बस की यात्रा में आई समस्याओं पर हास्य-व्यंग्य करते हुए अपनी बस यात्रा का रोचक वर्णन किया है। लेखक अपने चार मित्रों के साथ पन्ना शहर के लिए बस से निकलते हैं जहाँ से उन्हें सतना और बाद में ट्रेन से जबलपुर जाने का विचार किया होता है; किंतु इस बस में उन्हें जाना होता है उसकी हालत खस्ता होती है कुछ लोग उसे इस बस से सफर न करने की सलाह देते हैं। उनकी सलाह न मानते हुए, वे उसी बस से जाते हैं। बस की खस्ता हालत देखकर लेखक मज़ाक में उसे वयोवृद्ध की संज्ञा देते हैं और पूजनीय बताते हैं।

लेखक को पता चलता है कि बस एक एक हिस्सेदार भी उसी बस से यात्रा कर रहे होते हैं ।लेखक बस के चलने पर संदेह व्यक्त करते हैं तो हिस्सेदार पूर्ण विश्वास से कहते हैं कि बस अभी चलेगी। हालाँकि बस की जर्जर हालत देख कर लेखक और उनके मित्र बस में बैठना नहीं चाहते किंतु डॉक्टर मित्र के बस को अनुभवी बताने पर बैठ जाते हैं। थोड़ी देर में बस का इंजन सचमुच स्टार्ट हो जाता है और पूरी बस इस तरह हिलती है कि लेखक को लगता है कि वे सीट की जगह पर इंजन में ही बैठ गए है। बस इतनी पुरानी लग रही थी कि लेखक को लगता है कि जरूर गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के समय की है क्योंकि बस के सारे पुर्जे एक-दूसरे को असहयोग कर रहे थे।

कुछ समय की यात्रा के बाद बस रुक गई और पता चला कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर एक नली के सहारे तेल पहुँचा कर बस को चलाने का प्रयास करता है। ऐसी दशा देखकर लेखक सोचने लगा न जाने कब ब्रेक फेल हो जाए या स्टेयरिंग टूट जाए।पेड़ से टकरा जाए या झील में गोता लगा ले।अचानक बस फिर रुक जाती है। वृद्धा बस पर सवार होने के कारण उसका मन आत्मग्लानि से उठता है ।

थोड़ी देर में इंजन ठीक हो जाने पर बस फिर चल पड़ती है किन्तु इस बार और धीरे चलती है। उसकी लाइट्स भी बंद हो जाती है और वह चाँदनी में किसी तरह रेंगती हुई-सी चल ही रही थी कि थोड़ी ही देर में पुलिया पर पहुँचते ही टायर पंचर हो जाता है। पंचर टायर की जगह एक पुराने घिसे टायर को बदल कर बस को फिर से चलाया जाता है किंतु अब तक सभी यात्री समय पर पहुँचने की उम्मीद छोड़ देते है तथा चिंता मुक्त होने के लिए हँसी-मजाक करने लगते है।इस प्रकार अंत में लेखक डर मुक्त होकर सफ़र का आनंद उठाने की कोशिश करते हैं ।

कारण बताएँ

    उत्तर: लेखक जानता था कि बस कंपनी के हिस्सेदार भी उसी बस से यात्रा कर रहे थे। बस की खस्ता हालत थी। उसका कोई भी हिस्सा दूसरे भाग के साथ ताल-मेल नहीं कर पा रहा था। इंजन खराब था। लाइट्स खराब थी। टायर जर्जर हो चुके थे यह सब जानते हुए भी हिस्सेदार साहब थोड़े से पैसे बचाने के लिए बस को ठीक नहीं करवा रहे थे । वे अपनी और दूसरों की जान को दाँव में लगाकर बस से सफ़र कर रहे थे। लेखक ने जब हिस्सेदार को इस तरह बेवजह जोखिम उठाते देखा तो उन्होंने व्यंग्य में कहा कि उत्सर्ग और त्याग की यह भावना दुर्लभ है और इसीलिए लेखक के मन में हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा जाग गई।  

    उत्तर: लोगों ने यह सलाह इसलिए दी क्योंकि बस की हालत बहुत खराब थी । वह कहीं भी और कभी भी खराब हो सकती थी। अगर बस रास्ते में खराब हो जाए तो ऐसे में यात्रियों को रात बिताने में कठिनाई हो सकती थी।

      उत्तर: जब बस का इंजन स्टार्ट हुआ तो उसके कंपन और शोर से पूरी बस झनझना उठी। उसके बॉडी और सीट्स के बीच असहयोग चल रहा था । लेखक को प्रतीत हुआ कि पूरी बस ही इंजन है। सीट और बॉडी के बीच ताल-मेल का इतना अभाव था कि कभी लगता कि सीट बस को छोड़ कर आगे चली जाएगी तो कभी बस की बॉडी सीट को छॊड़ कर आगे बढ़ जाएगी। आठ-दस मील चलने पर बस के सभी हिस्सों का अंतर मिट-सा गया और लेखक को अंदाज ही नहीं रहा कि वे बस की सीट पर बैठे हुए थे या सीट ही यात्रियों पर बैठी हुई थी।

        उत्तर: बस की जर्जर अवस्था को देख कर लेखक ने अनुमान लगाया था कि शायद यह बस चल नही सकेगी। इस कारण उन्होंने बस के हिस्सेदार से इस बारे में पूछा। इस पर हिस्सेदार ने विश्वास से बताया कि यह बस अपने-आप चलती है। इतनी बुरी दशा और जर्जर बस के अपने-आप चलने की बात सुनकर लेखक को हैरानी हुई।

        उत्तर: बस की हालत खस्ता थी। बस की गति मात्र पंद्रह-बीस मील हो गई थी। लेखक को बस के किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। किसी भी क्षण ब्रेक फेल हो सकता है या स्टीयरिंग टूट सकता है। आस-पास प्रकृति के दृश्य मनमोहक थे। दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे। लेकिन लेखक प्रकृति की सुंदरता का आनंद नही ले सका क्योंकि उसे डर था कि किसी भी क्षण इनमें से किसी भी पेड़ से बस टकरा जाएगी। इसीलिए लेखक पेड़ों को अपना दुश्मन समझ रहा था।

        उत्तर: सविनय अवज्ञा आंदोलन मार्च 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया था। सविनय अवज्ञा आंदोलन का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी कानून के खिलाफ़ आवाज उठाना था। इस आंदोलन की शुरुआत गांधी के प्रसिद्ध दांडी मार्च से हुई। दांडी मार्च में गाँधी जी अपने अनुयायियों के साथ गुजरात स्थित अपने साबरमती आश्रम से लगभग 250 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए दाँडी गाँव गए और नमक बनाया । इस प्रकार गाँधी जी ने नमक कर के खिलाफ आवाज उठाई।

        उत्तर: सविनय अवज्ञा का अर्थ कानून के प्रति सम्मान जताते हुए शांति्पूर्ण और अहिंसक विरोध दर्शाना है । प्रस्तुत पाठ में बस की हालत खस्ता थी। उसका पुर्जा-पुर्जा हिल रहा था। बस कोई भी नियम मानती हुई नहीं लग रही थी। इंजन के शोर-गुल और कंपन से प्रतीत होता मानो इंजन में ही बैठे हो। सीट और बॉडी के बीच ताल-मेल का इतना अभाव था कि कभी लगता कि सीट बस को छोड़ कर आगे चली जाएगी, तो कभी बस की बॉडी सीट को छोड़ कर आगे बढ़ जाएगी। बस की इस जीर्ण-शीर्ण दशा को प्रकट करने के लिए ही व्यंग्यकार ने लिखा कि पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुजर रही थी।

        उत्तर: एक बार मैं अपने माता-पिता के साथ बंगलुरु से मैसूर की यात्रा कर रहा था। रास्ते में हमारी कार खराब हो गई। हम लोग बहुत परेशान हो गए। मेरे पिताजी ने कई लोगों से मदद के लिए आग्रह किया , किंतु किसी ने मदद नहीं की। शाम होने वाली थी। हमारी चिंता बढ़ गई। तभी एक कार पास आकर रुकी। कार में एक वृद्ध दंपति बैठे थे। उन्होंने हमारी समस्या पूछी। जब हमने उन्हें बताया कि हमारी कार के इंजन में कुछ समस्या आ गई है । तब उन्होंने बताया कि वे पास ही एक कस्बे में रहते हैं । उन्होंने हमें अपने साथ आने का आग्रह किया। दूसरा कोई विकल्प न होने के कारण हम उनके साथ उनके घर गए। उन्होंने बड़े प्यार और आग्रह से हमें नाश्ता कराया। फिर वे एक मैकेनिक लेकर हमारी कार तक छोड़ने आए। मैकेनिक ने कुछ ही देर में कार ठीक कर दी। हम उन्हें धन्यवाद करते हुए आगे बढ़ गए। मैं और मेरे माता-पिता उन वृद्ध दंपति के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेंगे। दुनिया में जहाँ स्वार्थी और धोखेबाज़ लोग हैं वहीं दयालू और परोपकारी भी। मैं उन दयालु वृद्ध दंपति को सदैव अपना आदर्श मानुँगा और याद रखुँगा।

        (नोट: छात्र इसी प्रकार अपने जीवन के अनुभव लिखने का प्रयास करें।

          उत्तर: बस : वाहन /सवारी 1. आज सुबह मेरी बस देर से आई। 2. सौम्या आज स्कूल नहीं आई क्योंकि उसकी बस छूट गई।

          वश{ नियंत्रण/अधीनता ; 1. इस शरारती बच्चे को संभालना सबके वश की बात नही। 2. भाग्य लिखना हमारे वश में नहीं किंतु कर्म करना तो हमारे वश में है।

          बस : पर्याप्त /काफी 1. बस ! बस ! इससे अधिक खाना मैं नहीं खा सकूँगी। 2. आज मैं बस इतना ही काम करूँगी।

          उत्तर: कि ’ के लिए वाक्य

          1. लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा।
          2. लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र रास्ते में डाकू मिलते हैं?

          की ’ के लिए वाक्य

          1. बस की रफ़्तार अब पंद्रह-बीस मील हो गई थी।
          2. धीरे-धीरे वृद्धा की आँखों की ज्योति जाने लगी।

          उत्तर: गति के लिए प्रयुक्त क्रियाएँ और उनके वाक्य-प्रयोग

          चलना: बस धीरे-धीरे चलने लगी।

          दौड़ना: बच्चे मैदान में दौड़ रहे हैं।

          भागना: भागते-भागते हम दोनों घर से बहुत दूर निकल गए।

          खिसकना: पुलिस को देखकर चोर चुपचाप खिसक लिये।

          कूदना: बच्चे उत्साह से हरी घास में कूदने लगे।

          फुदकना: बारिश होते ही खेत में मेंढक फुदकने लगे।

            उत्तर: (क) जल = पानी, जलना

            वाक्य प्रयोग : 1. जल बरसते ही जहाँ किसान का हृदय नाच उठता है ; वहीं कुम्हार का मन जल उठता है।

            2. आसमान से जल बरसते ही जलते हुए दीपक बुझ गए।

            (ख) हार = पराजय, फूलों या मोतियों आदि की माला।

            वाक्य प्रयोग : 1. हारने वाले को निराशा और जीतने वालों को फूलों के हार मिले।

            2. विद्योत्तमा ने प्रण किया कि वह उसी के गले में विजय का हार डालेगी जिससे शास्त्रार्थ में हार जाएगी।

            गुणवाचक विशेषण : काला कोट, मोटा लड़का; सुंदर लड़की

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