लेखक का जन्म का मूल नाम हिम्मतलाल द था दस वर्ष की आयु में ये साधुओं के साथ हिमालय की ओर चले गए थे। जहाँ इन्होंने सन्यास आश्रम में दीक्षा ली । तब इन्हें स्वामी आनंद नाम प्राप्त हुआ।

स्वामी आनंद (गाँधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संन्यासी)

सन् 1887

किमड़ी गाँव , काठियावाड़ जिला, गुजरात ।

स्वामी आनंद के पिता का नाम रामचंद्र दवे था वे पेशे से एक अध्यापक थे। उनकी माता का नाम पार्वती दवे था। वे एक गृहणी थीं।

स्वामी आनंद ने बहुत कम आयु में ही घर छोड़ दिया था जब एक साधु ने उनसे भगवान तो दिखाने का दावा कर साथ चलने को कहा। तब से वे लगातार साधुओं की संगति में रहे और उन्हीं से शिक्षा पाई। वे बहुभाषी थे। उन्हें गुजराती, मराठी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेज़ी और हिंदी में प्रवीणता प्राप्त थी।

स्वामी आनंद यद्यपि राम-कृष्ण मिशन से जुड़े हुए थे , किंतु सन् 1905 में वे बंगाल के क्रांतिकारी दलों के संपर्क में आए । यहीं से सन्1907 में वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से पूरी तरह जुड़ गए। महाराष्ट्र से कुछ समय तक ’तरुण हिंद’ नामक अखबार निकाला। इसके बाद बालगंगाधर तिलक द्वारा निकाले जाने वाले अखबार ’ केसरी ’ के लिए कार्य किया। सन् 1917 गाँधी जी के संपर्क में आए और उनके ही निर्देशन में ’नवजीवन’ और ’यंग इंडिया’ के प्रसार की जिम्मेदारी ले ली। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम के कार्यकर्ता के रूप में भी काम किया।मराठी डेली के गुजराती संस्करण ’राष्ट्रमत’ के लिए भी संपादन कार्य किया। संपूर्ण भारत की यात्रा कर स्वतंत्रता संग्राम के लिए जनजागरण किया। आजादी के बाद स्वामी आनंद ने ग्रामीण भारत के उत्थान और कृषि के विकास हेतु जागृति फ़ैलाने का प्रयास किया।

स्वामी आनंद की भाषा सरल-सहज है। अपनी लेखनी द्वारा वे रेखा-चित्र उकेरने में सक्षम हुए है। उनकी लेखनी ने प्रस्तुत पाठ ’शुक्रतारे के समान ’में महादेव भाई का ऐसा गरिमापूर्ण परिचय दिया है कि पाठको को महादेव भाई के व्यक्तित्व पर गर्व हो उठता है।

स्वामी आनंद ने अपने जीवन में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों के लिए कार्य करने के दौरान विज्ञान , धर्म और सामाजिक मुद्दों पर लिखा है। उनके लेखन में गाँधीजीना सन्स्मारानो, भगवान बुद्ध, कुलकथाओं, धरतीनु लुन, आदि अनेक गुजराती और मराठी पुस्तके लिखीं। उन्होंने अनेक यात्रा वृतांत, चरित्रों के रेखाचित्र लिखे।

स्वामी आनंद को अपनी रचनाओं के लिए अनेक सम्मन मिले। ’कुलकथाओं” जिसमें उन्केहोंने भाटिया जाति के लोगों के चरित्रों का संकलन लिखा है उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ । स्वामी आनंद ने पुरस्कार तो स्वीकार किया किंतु धनराशि लेने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने अपने लेखन कार्य के लिए किसी भी प्रकार की धनराशि न लेने की शपथ ली थी।

’शुक्रतारे के समान’ लेख में स्वामी आनंद ने अपने मित्र और सहकर्मी तथा गाँधी जी के सहयोगी व निजी सचिव ’ महादेव भाई देसाई’ का रेखाचित्र उकेरा है जिसके माध्यम से उन्होंने महादेव भाई के देशप्रेमी, मृदुभाषी, स्वार्थपरता रहित , कर्मठ और बेजोड़ प्रतिभा के धनी व्यक्तित्त्व का परिचय कराया है।

महादेव भाई( बाएं) गाँधी जी के साथ

महादेव भाई का पूरा नाम महादेव हरिभाई देसाई था। इनका जन्म 1 जनवरी 1892 को एक स्कूल शिक्षक हरिभाई देसाई और उनकी पत्नी जमनाबहन के घर हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा सूरत शहर में  हुई थी बाद में बंबई (अब मुंबई) के एलफ़िंस्टन कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली, तत्पश्चात1913 में एलएलबी की उपाधि प्राप्त करने के बाद बॉम्बे में केंद्रीय सहकारी बैंक में एक निरीक्षक के रूप में नौकरी की।

महादेव भाई 1915 में पहली बार गाँधी जी के संपर्क में आए और 1917 से अपनी पत्नी दुर्गाबहन के साथ पूर्णकालिक स्वयंसेवक कार्यकर्ता के रूप में गाँधी जी से जुड़ गए। 15 अगस्त 1942 में अपनी मृत्यु होने तक निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य निष्ठा के साथ गाँधी जी के निजी सचिव के तौर पर कार्यकरते रहे। इनके इसी सेवा भाव को देखते हुए इन्हें  “गांधी जी का बोसवेल” , गांधी के “सुकरात का प्लेटो” , साथ ही गांधी के “बुद्ध का आनंद ” आदि के रूप में संबोधित किया जाता रहा।

प्रस्तुत लेख में लेखक स्वामी आनंद महादेव भाई के व्यक्तित्व, उनकी ऊर्जा, लगन , बेजोड़ प्रतिभा का चित्रण कर पाने में सफल हुए हैं। लेखक ने महादेव भाई के कर्मठता, सरलता, सज्जनता , लगन , निराभिमान , मृदुभषितापूर्ण जीवन का ऐसा सुंदर चित्रण किया है कि पाठक उनके व्यक्तित्व से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

लेखक के अनुसार कोई भी महान व्यक्ति, महानतम कार्य तभी कर सकता उसके साथ ऐसे सहयोगी हों जो उसकी तमाम इतर चिंताओं और उलझनों को अपने सिर ले ले। गाँधी जी के लिए महादेव भाई और भाई प्यारे लाल जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। जिनमें से हम महादेव भाई के बारे में इस पाठ में पढ़ेंगे।

“शुक्रतारे के समान ” पाठ के लेखक स्वामी आनंद हैं।इन्होंने यहाँ शुक्रतारे के बारे में बताया है कि शुक्र तारा चंद्रमा साथी माना जाता है जो शाम को अथवा भोर में बहुत ही कम समय के लिए दिखाई देता है किंतु अपनी चमक से सबको प्रभावित करता है और अस्त हो जाता है। इसी तरह गाँधी जी के निजी सचिव महादेव भाई भी अल्प काल के लिए संसार रूपी आकाश पटल पर प्रकट हुए और अस्त हो गए। अपने जीवन काल में वे गाँधी जी के सर्वेसर्वा थे। वे स्वयं को गाँधी जी का ”हम्माल’ और ’पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ आदि के रूप में परिचय कराने में गौरव का अनुभव करते थे।

गाँधी जी महादेव भाई को पुत्र से भी अधिक मानते थे। 1917 में महादेव भाई गाँधी जी के पास पहुँचे थे तभी गाँधी जी ने उनकी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के समय विरोध के लिए जाते समय गाँधी जी को पलवल स्टेशन मे गिरफ़्तार कर लिया गया तो गाँधी जी ने महादेव को अपना वारिस बताया । सन् 1929 तक वे पूरे भारत के कोने-कोने में लोकप्रिय होचुके थे। इस दौरान पंजाब में फ़ौजी शासन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और पत्रकारों पर कहर ढाया गयाऔर आजन्म सजाएँ और काला-पानी भेज दिया गया, जिनमें एक मुख्य राष्ट्रीय दैनिक पत्र ’ट्रिब्यून” के संपादक श्री कालीनाथ राय भी थे। लोग गामदेवी के मणिभवन पहुँचकर गाँधीजी को अंग्रेजों के अत्याचारों की कहानी सुनाने आते थे । जिस पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ तैयार गाँधी जी के पेश करते और लोगों को गाँधी जी से मिलवाते थे। इन सब पर गाँधी जी के बंबई(मुंबई) की मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक ” बाम्बे क्रानिकल” में कई लेख छापे जाते थे ।

इसी कारण “क्रानिकल” के निडर अंग्रेज संपादक हार्नीमैन को भारत से निकाला देकर वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। उन दिनों बंबई के तीन नेता शंकर लाल बैंकर, उम्मर सोवानी और जमनादास द्वारकादास (श्रीमती एनी बेसेंट के अनुयायी) ’यंग इंडिया’ नाम से एक अंग्रेजी साप्ताहिक क निकालते थे जिसमें मुख्य रूप से हार्नीमैन ही लिखते थे।जिनके जाने से अब लिखने वालों की कमी रहने लगी। ये तीनों नेता गाँधी जी से भी प्रभावित थे इसलिए उन्होंने गाँधी जी से अपने साप्ताहिक ’यंग इंडिया’ की बागडोर सम्हालने का अनुरोध किया जिसे गाँधी जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसी दौरान गाँधी जी का कार्य इतना बढ़ गया कि “यंग इंडिया ” को सप्ताह में दो बार प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया। इस वजह से “यंग इंडिया ” में छपने वाले सभी लेख टिप्पणियाँ, गाँधी जी के लेख , पंजाब मामले का सार-संक्षेप आदि को लेखक स्वामी आनंद और महादेव भाई को मिलकर तीन दिन में तैयार करने होते थे।

” यंग इंडिया” के बाद “नवजीवन’ साप्ताहिक का संपादन भी गाँधी जी के पास आ गया और दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलने लगे। लेखक इस दौरान साबरम्ती आश्रम रहे जिस कारण इन साप्ताहिकों के छापाखाने, हिसाब-किताब और डाक से पोस्ट करने की जिम्मेदारी लेखक के पास आ गई। महादेव भाई और गाँधी जी अपना अधिकतम समय देश-भ्रमण कर कार्यक्रमों में बिताने लगे। जिनमें भारी भीड रहती। जिसका ब्यौरा महादेव भाई जहाँ होते वहीं से भेजते। पूरे देश के उग्र और उदार दलों के नेता, देशभक्त और क्रांतिकारी , देश-विदेश के विद्वान , संवाददाता आदि गाँधी जी को पत्र लिखते थे। गाँधी जी यंग इंडिया के कॉलम में इसकी चर्चा करते थे। महादेव भाई इन सभी यात्राओं , गतिविधियों, सभाओं के साप्ताहिक विवरण भेजा करते।

महादेव भाई देश के अग्रगण्य समाचार पत्रों पर भी नज़र रखते और समय-समय पर उनको आड़े हाथ लेते हुए टीका-टिप्पणी करते थे। लेकिन ऐसे समय पर भी उनकी भाषा संयमित रहती। अपने बेजोड़ कॉलम, भर्पूर चौकसाई और गाँधी जी के कट्टर आदर्शों को अपनाते हुए भद्र भाषा के प्रयोग ने उन्हें सबका लाड़ला बना दिया। गाँधी जी के पास आने से पहले महादेव भाई ने ब्रिटिश सरकार के अनुवाद-विभाग में काम किया था। नरहरि भाई उनके घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने पहले साथ में वकालत का काम किया था इस पेशे में गलत को भी सही साबित करना पड़ सकता है , साथ ही साहित्य से इसका कोई संबंध नहीं। इस लिए दोनों का मन इसमें न लगा और दोनों ने साथ में टैगोर, शरत चंद्र की कहानियों का अनुवाद किया।

महादेव भाई की लिखावट बहुत सुंदर थी। यहाँ तक कि भारत के तत्कालीन वायसराय भी उनकी लिखावट पर मंत्रमुग्ध थे। उनका शुद्ध और सुंदर लेखन पढ़ने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता था। वे शॉर्टहैंड नहीं जानते थे इसलिए वे सभी व्याख्यान, प्रवचन , वार्तालाप आदि जेट की सी तेज़ी से पूरा का पूरा लिख लेते थे। यहाँ तक कि जब देश-विदेश के पत्रकार, ्ग्रंथकार गाँधीजी के लेखों को शॉर्टहैंड में लिखकर टाईप कर गाँधी जी से ओके कराने आते तो गाँधी जी उनसे महादेव भाई के साथ मिलान करने को कहते। महादेव भाई के लेखन में इतनी शुद्धता थी कि कॉमा की भी गलती संभव न थी। यहाँ तक कि तब के जाने-माने लेखक लुई फिशर और गुंथर जैसे लेखक भी महादेव भाई के साथ मिलान किए बिना और सुधारे बिना गाँधी जी के पास ले जाने से हिचकते थे।

देश-भर की यात्रा के दौरान भी महादेव भाई अपने बड़े -बड़े झोलों में ताजे समाचार पत्र ठूँस कर रखते और पढ़ते रहते। यही नहीं , वे यात्राओं के दौरान ’यंग इंडिया’ और’नवजीवन’ के लिये लेख लिखते रहते। लगातार चलती यात्राओं विशाल सभाओं और व्यस्ततम कार्यक्रम के दौरान वे कब अपने दैनिक कार्य यथा नहाना, खाना आदि करये इसका पता भी न चलता। लेकिन इतनी व्यस्तता के बावजूद भी वे कभी सूत कातना न भूलते थे। वे बहुत महीन और सुंदर सूत कातते थे। उनकी भाषा और व्यवहार इतना नम्र और निर्मल था कि उनके संपर्क में आने वाले व्यक्ति उनके प्रशंसक बन जाते उनसे मिलने वाले व्यक्तियों पर मानो उनकी मोहिनी का नशा सा चढ़ जाता था।

महादेव भाई का व्यक्तित्व महात्मा गाँधी के जीवन से इतना एकाकार हो चुका था कि महात्मा गाँधी से अलग उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। महादेव भाई को उत्कृष्ट कोटी की शिष्ट भाषा, संस्कार-संपन्नौर मनोहारी लेखन शैली ईश्वरीय देन के रूप में मिली थी किंतु महात्मा गाँधी के साथ रहते हुए अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें साहित्य रचना के लिए समय ही न मिला। फ़िर भी उन्होंने महात्मा गाँधी की आत्म कथा ’सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेजी अनुवाद किया जो ’नवजीवन’ में प्रकाशित मूल गुजराती की तरह हर हफ़्ते ’यंग इंडिया” में छपता रहा। इस पुस्तक के बाद में अनेक संस्करण बिके।

सन् 1934-35 में महात्मा गाँधी वर्धा के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद अचानक सेवागाँव की सरहद पर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। वहीं महादेव भाई दुर्गा बहन और चि. नारायण( पुत्र) के साथ मगनवाड़ी में रहने लगे। वहाँ से वे प्रतिदिन सेवाग्राम पैदल चल कर पहुँचते थे। वहाँ दिन भर काम कर शां को वापस आते। इस प्रकार आते-जाते पूरे 11 मील चलते भीषण गर्मी में लंबे समय तक चलने वाली इस दिनचर्या का महादेव भाई के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और उनकी अकाल मृत्यु का कारण बना। उनकी मृत्यु से गाँधी जी को गहर आघात पहुँचा वे अकसर उनकी याद में भर्तहरि के के भजन की पंक्तियाँ दोहराते थे

” ए रे जखम जोगे नहिं जशे” अर्थात यह घाव कभी योग से नहीं भरेगा।

सालों के बाद भी गाँधी जी प्यारेलाल जी को बुलाते समय अकसर’महादेव” ही कह देते थे।

शब्दार्थ
आभा-प्रभा – चमक Shine,Aura, blaze
नक्षत्र मंडल – तारा समूह, Constellation, Stars
विनोद – मज़ाक, humor
हम्माल – बोझ उठाने वाला, कुली, Coolie A person who carries luggage
पीर – महात्मा, सिद्ध, Sufi spiritual leader.
बावर्ची – खाना पकानेवाला, रसोइया, cook,
भिश्ती – मशक से पानी ढोनेवाला व्यक्ति
खर – गधा, Donkey

कलगी– सिरमौर , शिखर crest

तेजस्वी– ओजस्वी Majestic

व्याख्या – महादेव भाई का परिचय कराते हुए लेखक उनकी तुलना आकाश के हजारों तारों के बीच शुक्र तारे से करते हुए कहता है कि शुक्र तारा चंद्रमा के पास ही चमकता है और दुनिया भर के कवि उसकी प्रशंसा में गीत लिखते नहीं थकते।किंतु शुक्र तारा सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए उदित होता है और अस्त हो जाता है। यह सबसे अनोखा शुक्र तारा सुबह या शाम को सिर्फ़ एक या दो घंटे तक दिखाई देता है अपने आभा से सबको लुभाकर अस्त हो जाता है। इसी प्रकार पाठ के मुख्य पात्र और लेखक के साथी महादेव जी भी शुक्र तारे की तरह थोड़ी देर के लिए इस संसार रुपी आकाश को अपने सेवा भाव से चमका कर शुक्र तारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए अर्थात उनका निधन हो गया। महादेव भाई सेवा-धर्म का पालन करने के लिए इस धरती पर जन्मे थे। स्वर्गीय महादेव देसाई गांधीजी के मंत्री थे। मित्रों के बीच हँसी- मज़ाक में अपने को गांधीजी का सामान ढोने वाला कुली कहने में और कभी-कभी अपना परिचय गाँधी जी को सलाह देने के कारण पीर, उनके खाना पकाने वाले बावर्ची , मशक से पानी ढोने वाले व्यक्ति अथवा गधे के रूप में देने में भी वे गौरव का अनुभव किया करते थे।

शब्दार्थ –
आसेतुहिमाचल – सेतुबंध रामेश्वरम से हिमाचल तक

उत्तराधिकारी – वारिस, Successor

व्याख्या –  गांधीजी महादेव भाई को पुत्र से भी अधिक मानते थे। जब सन् 1917 में महादेव गांधीजी के पास पहुँचे थे, तभी गांधीजी ने उनकी योग्यता को तुरंत पहचान लिया और अपने उत्तराधिकारी का पद सौंप दिया। सन् 1919 में जलियाँवाला बाग के हत्याकांड के दिनों में पंजाब जाते हुए गांधीजी को पलवल स्टेशन पर गिरफ़तार किया गया था। गांधीजी ने उसी समय महादेव भाई को अपना वारिस heir कहा था। सन् 1929 में महादेव भाई सेतुबंध रामेश्वर से हिमाचल तक देश के चारों कोनों में पहचाने जाने लगे, पूरे देश के दुलारे बन चुके थे। सभी उनसे प्यार व् अपनापन रखने लगे थे।

शब्दार्थ –

उम्र-कैद – आजीवन कारावास , life imprisonment

व्याख्या- लेखक कहता है कि इसी बीच पंजाब में फौजी शासन के कारण जो अत्याचार किया गया था, उसके बारे में रोज़-रोज़ ख़बरें आने लगी थी। पंजाब के अधिकांश नेताओं को गिरफ़्ता‍र करके फौजी कानून के तहत आजीवन कारावास की सज़ाएँ देकर कालापानी भेज दिया गया। लाहौर के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक पत्र ‘ट्रिब्यून’के संपादक श्री कालीनाथ राय को 10 साल की जेल की सज़ा मिली।

शब्दार्थ –

ज़ुल्मों और अत्याचारों – प्रताड़ना और उत्पीड़न oppression and atrocities

टिप्पणियाँ – राय,टीका, Comments, Remarks

व्याख्या – – ब्रिटिश शासन के प्रताड़ना और उत्पीड़न से परेशान लोग उनकी आपबीती को गाँधी जी को सुनाने के लिए समूहों में गामदेवी के मणिभवन में बड़ी संख्या में आते थे। महादेव भाई उनकी बातों की छोटी टिप्पणी तैयार कर गाँधी जी के सामने रखते और उनकी गाँधी जी से मुलाकातें भी करावाते थे। गांधीजी बंबई’के मुख्य राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक समाचार पत्र ‘बाम्बे क्रानिकल’में इन सब विषयों पर लेख लिखा करते थे। ज्यादा समाचार होने के क्रानिकल में जगह कम पड़ जाती थी।

शब्दार्थ –

साप्ताहिक– हर सात दिनों में एक बार होने वाला Weekly

देश निकाला – देश से बाहर कर देना Exile

व्याख्या – उन दिनों एक निडर अंग्रेज सम्पादक हार्नीमैन अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के बारे में जानकारी देते हुए शासन के विरुद्ध समाचार छाप रहे थे। इस कारण उसे सजा के तौर पर भारत से बाहर वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। उन दिनों बंबई के तीन नए नेता शंकर लाल बैंकर, उम्मर सोबानी और जमनादास द्वारकादास थे।जिनमें से अंतिम जमनादास द्वारकादास जी श्रीमती एनी बेसेंट के अनुयायी थे ये तीनों बंबई (मुंबई) से ’यंग इंडिया’ नाम का एक समाचार पत्र निकालते थे। इनके अखबार में मुख्य रूप से सम्पादक हार्नीमैन ही लिखते थे। उनके इंग्लैंड चले जाने से ’यंग इंडिया’ में लिखने वालों की कमी रहने लगी। तीनों नेता गाँधी जी के भी प्रशंसक थे। उन्होंने गाँधी जी से ’यंग इंडिया’ की बाग-डोर सम्हालने की विनती की। गाँधी जी को तो इसकी आवश्यकता ही थी उन्होंने तुरंत इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

शब्दार्थ
पत्र-व्यवहार  पत्र द्वारा बात-चीत Correspondence

आम सभाएँ – सामान्य बैठकें, general meetings

व्याख्या –इस दौरान गांधीजी का काम इतना बढ़ गया कि समाचार पत्र और साप्ताहिक पत्र भी कम पड़ने लगा। इसी कारण गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ जो कि एक साप्ताहिक पत्र था उसे हफ्ते में दो बार प्रकाशित करने का निश्चय किया। इस से काम अधिक हो गया । हर रोज़ का पत्र-व्यवहार और मुलाकातें, सामान्य बैठकें, आदि कामों के अलावा ‘यंग इंडिया’ साप्ताहिक में छापने के लेख, टिप्पणियाँ, पंजाब के मामलों का सार-संक्षेप और गांधीजी के लेख यह सारी सामग्री लेखक स्वामी आनंद तथा महादेव भाई मिलकर मात्र तीन दिन में ही तैयार कर लेते।

शब्दार्थ

व्यवस्था– प्रबंध management

देश भ्रमण – देश का दौरा, पूरे देश में घूमना, Country tour/Visit

व्याख्या – यंग इंडिया’ के बाद ‘नवजीवन’ का संपादन भी गांधीजी को ही मिल गया और दोनों पत्रिकाओं को अहमदाबाद से साप्ताहिक के तरह निकालने लगे। लेखक स्वामी आनंद भी छह महीनों के लिए साबरमती आश्रम में रहे और तब शुरू में ग्राहकों के हिसाब-किताब की और साप्ताहिकों को डाक में डलवाने की जिम्मेदारी लेखक के हिस्से आई। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद संपादन सहित दोनों साप्ताहिकों की और छापाखाने की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी लेखक के ऊपर आ गई। इसका कारण यह था कि गांधीजी और महादेव का सारा समय देश यात्रा में गुजरने लगा। लेकिन फिर भी वे जहाँ भी होते , वहीं से महादेव भाई अपने दैनिक कामों , कार्यक्रमों की व्यस्तता के बीच समय निकाल कर लेख लिखते थे और लेखक को भेजते।

शब्दार्थ

संवाददाता-  पत्रकार , समाचारदाता, रिपोर्टर ,Reporter
 गतिविधियों-
कार्यकलाप ,Activity

धुरंधर- विद्वान , ज्ञानी ,श्रेष्ठ Stalwart

व्याख्या-  आजादी के समय दो तरह के क्रांतिकारी थे एक वे जो शक्ति प्रयोग कर अंग्रेजों को भारत से भगाना चाहते थे वे उग्र क्रांतिकारी कहलाए , दूसरे जो अहिंसा का सहारा लेकर विरोध प्रदर्शन कर अंग्रेजों से छुटकारा पाना चाहते थे। ये दोनों प्रकार के देशभक्त, क्रांतिकारी और दुनिया भर से आने वाले विद्वान , पत्रकार आदि गाँधी जी का सम्मान करते थे और उनसे आशा रखते थे। इसलिए वे सब विभिन्न मुद्दों पर गाँधी जी को पत्र लिखते थे और गाँधी जी उस बारे में अपने समाचार पत्र ’यंग इंडिया’ में चर्चा करते थे। महादेव गांधीजी की यात्राओं के और उनकी हर दिन की गतिविधियों के साप्ताहिक ब्यौरा भेजा करते।

संवाददाता-  पत्रकार , समाचारदाता, रिपोर्टर ,Reporter
 गतिविधियों-
कार्यकलाप ,Activity

धुरंधर- विद्वान , ज्ञानी ,श्रेष्ठ Stalwart

व्याख्या-  आजादी के समय दो तरह के क्रांतिकारी थे एक वे जो शक्ति प्रयोग कर अंग्रेजों को भारत से भगाना चाहते थे वे उग्र क्रांतिकारी कहलाए , दूसरे जो अहिंसा का सहारा लेकर विरोध प्रदर्शन कर अंग्रेजों से छुटकारा पाना चाहते थे। ये दोनों प्रकार के देशभक्त, क्रांतिकारी और दुनिया भर से आने वाले विद्वान , पत्रकार आदि गाँधी जी का सम्मान करते थे और उनसे आशा रखते थे। इसलिए वे सब विभिन्न मुद्दों पर गाँधी जी को पत्र लिखते थे और गाँधी जी उस बारे में अपने समाचार पत्र ’यंग इंडिया’ में चर्चा करते थे। महादेव गांधीजी की यात्राओं के और उनकी हर दिन की गतिविधियों के साप्ताहिक ब्यौरा भेजा करते।

गद्यांश 8-इसके अलावा महादेव, देश-विदेश के अग्रगण्य समाचार-पत्र, जो आँखों में तेल डालकर गांधीजी की प्रतिदिन की गतिविधियों को देखा करते थे और उन पर बराबर टीका-टिप्पणी करते रहते थे, उनको आडे़ हाथों लेने वाले लेख भी समय-समय पर लिखा करते थे।
बेजोड़ काॅलम, भरपूर चैकसाई, ऊँचे-से-ऊँचे ब्रिटिश समाचार-पत्रों की परंपराओं को अपनाकर चलने का गांधीजी का आग्रह और कट्टर से कट्टर विरोधियों के साथ भी पूरी-पूरी सत्यनिष्ठा में से उत्पन्न होने वाली विनय-विवेक-युक्त विवाद करने की गांधीजी की तालीम इन सब गुणों ने तीव्र मतभेदों और विरोधी प्रचार के बीच भी देश-विदेश के सारे समाचार-पत्रों की दुनिया में और एंग्लो-इंडियन समाचार-पत्रों के बीच भी व्यक्तिगत रूप से एम.डी. को सबका लाडला बना दिया था

शब्दार्थ
तालीम – शिक्षा Education

अग्रगण्य- शीर्ष , मुख्य, प्रमुख Top most

आँखों में तेल डालकर देखना-चौकस होकर देखना, ध्यान से देखना Looking Carefully, attentvely.

टीका-टिप्पणी करना– आलोचना करना

विवाद -मतभेद, विरोधी विचार, Dispute  controversy

व्याख्या –इसके अलावा महादेव, देश-विदेश के मुख्य समाचार-पत्र, जो चौकस होकर गांधीजी की प्रतिदिन के क्रियाकलाप पर आँखें गढ़ाए रखते थे और उन पर बराबर आलोचना करते रहते थे, महादेव उन पर भी अवसर पाते ही कड़े जवाब देते लेख समय-समय पर लिखा करते थे। भरपूर चौकस रहते हुए, ऊँचे-से-ऊँचे ब्रिटिश समाचार-पत्रों की परंपराओं को अपनाकर चलने का गांधीजी का आग्रह और घोर विरोधियों के साथ भी पूरी-पूरी सच्चाई के साथ ही विनम्रता और विवेक से भरे विवाद करने की गांधीजी की शिक्षा, इन सब गुणों ने तीव्र मतभेदों और विरोधी प्रचार के बीच भी देश-विदेश के सारे समाचार-पत्रों की दुनिया में और एंग्लो-इंडियन समाचार-पत्रों के बीच भी व्यक्तिगत रूप से महादेव को सबका प्यारा बना दिया था। क्योंकि महादेव ने कामों के साथ-साथ सभी के साथ संबंधों को बड़े अच्छे से निभा रखा था।

गद्यांश 9 – गांधीजी के पास आने के पहले अपनी विद्यार्थी अवस्था में महादेव ने सरकार के अनुवाद-विभाग में नौकरी की थी। नरहरि भाई उनके जिगरी दोस्त थे। दोनों एक साथ वकालत पढे़ थे। दोनों ने अहमदाबाद में वकालत भी साथ-साथ ही शुरू की थी। इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करना होता है। साहित्य और संस्कार के साथ इसका कोई संबंध नहीं रहता। लेकिन इन दोनों ने तो उसी समय से टैगोर, शरदचंद्र आदि के साहित्य को उलटना-पुलटना शुरू कर दिया था।‘चित्रांगदा’ कच-देवयानी की कथा पर टैगोर द्वारा रचित ‘विदाई का अभिशाप’ शीर्षक नाटिका, ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि अनुवाद उस समय की उनकी साहित्यिक गतिविधियों की देन हैं।

शब्दार्थ
जिगरी दोस्त – घनिष्ट मित्र

अनुवाद-विभाग– translation department

व्याख्या – गांधीजी के पास आने के पहले महादेव ने -अपने विद्यार्थी जीवन में सरकार के अनुवाद-विभाग में नौकरी की थी। नरहरि भाई उनके पक्के मित्र थे। दोनों ने एक साथ वकालत की पढ़ाई की थी। दोनों ने अहमदाबाद में वकालत भी साथ-साथ ही शुरू की थी।लेखक कहता है कि वकालत के पेशे में आमतौर पर काले को सफेद और सफेद को काला करना होता है। अर्थात वकालत के पेशे में झूठ को सच और सच को झूठ करना होता है। साहित्य और संस्कार के साथ इसका कोई संबंध नहीं रहता। लेकिन इन दोनों ने तो उसी समय से टैगोर, शरदचंद्र आदि के साहित्य को उलटना-पुलटना शुरू कर दिया था।
‘चित्रांगदा’ कच-देवयानी की कथा पर टैगोर द्वारा रचित ‘विदाई का अभिशाप’ शीर्षक नाटिका, ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि अनुवाद उस समय की उनकी साहित्यिक गतिविधियों की देन हैं।

गद्यांश 10 –भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधीजी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे। भले ही उन दिनों ब्रिटिश सल्तनत पर कहीं सूरज न डूबता हो, लेकिन उस सल्तनत के ‘छोटे’ बादशाह को भी गांधीजी के सेक्रेटरी के समान खुशनवीश (सुन्दर अक्षर लिखने वाला लेखक) कहाँ मिलता था? बड़े-बड़े सिविलियन और गवर्नर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर भी मिलता नहीं था। पढ़ने वाले को मंत्रमुग्ध करने वाला शुद्ध और सुंदर लेखन।

शब्दार्थ
कोई सानी नहीं– उनके समान अन्य कोई नहीं

सल्तनत हुकूमत, kingdom

व्याख्या – लेखक कहता है कि भारत में महादेव के अक्षरों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता था, कोई भी महादेव की तरह सुन्दर लिखावट में नहीं लिख सकता था। वाइसराय के नाम जाने वाले गांधीजी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाईस रॉय भी जलन करने लगते थे। भले ही उन दिनों भारत पर ब्रिटिश सल्तनत की पूरी हुकूमत थी, लेकिन उस हुकूमत के ‘छोटे बादशाह’ अर्थात वाइसराय को भी गांधीजी के सेक्रेटरी यानि महादेव के समान सुन्दर अक्षर लिखने वाला लेखक नहीं मिला था? बड़े-बड़े सिविलियन और गवर्नर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर भी मिलता नहीं था। महादेव का शुद्ध और सुंदर लेखन पढ़ने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता था।

गद्यांश 11-– महादेव के हाथों के लिखे गए लेख, टिप्पणियाँ, पत्र, गांधीजी के व्याख्यान, प्रार्थना-प्रवचन, मुलाकातें, वार्तालापों पर लिखी गई टिप्पणियाँ, सब कुछ फुलस्केप चौथाई आकारवाली मोटी अभ्यास पुस्तकों में, लंबी लिखावट के साथ, जेट की सी गति से लिखा जाता था। वे ‘शॅार्टहैंड’जानते नहीं थे।

शब्दार्थ
व्याख्यान– भाषण, परिचर्चा,Lecture

मुलाकातें – बैठक, meetings

चौथाई– चौथा भाग

व्याख्या –महादेव भाई को शॉर्टहैंड नहीं आता था इसलिए वे गाँधी जी की टिप्पणियाँ, पत्र, गांधीजी के भाषण, प्रार्थना-प्रवचन, मुलाकातें, वार्तालापों पर लिखी गई टिप्पणियाँ, सब कुछ कागज़ के एक आकार के चौथे भाग के आकार वाली मोटी अभ्यास पुस्तकों में, लंबी लिखावट के साथ, बहुत ही तेज गति से लिख लेते थे।

गद्यांश 12 –बडे़-बडे़ देशी-विदेशी राजपुरुष, राजनीतिज्ञ, देश-विदेश के अग्रगण्य समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि, अंतरष्ट्रीय संगठनों के संचालक, पादरी, ग्रंथकार आदि गांधीजी से मिलने के लिए आते थे। ये लोग खुद या इनके साथी-संगी भी गांधीजी के साथ बातचीत को ‘शाॅर्टहैंड’ में लिखा करते थे। महादेव एक कोने में बैठे-बैठे अपनी लम्बी लिखावट में सारी चर्चा को लिखते रहते थे। मुलाकात के लिए आए हुए लोग अपनी मुकाम पर जाकर सारी बातचीत को टाइप करके जब उसे गांधीजी के पास ‘ओके’ करवाने के लिए पहुँचते, तो भले ही उनमें कुछ भूलें या कमियाँ-खामियाँ मिल जाएँ, लेकिन महादेव की डायरी में या नोट-बही में मजाल है कि कॉमा मात्र की भी भूल मिल जाए।

शब्दार्थ
राजपुरुष– The royal man

राजनीतिज्ञ– राजनेता , Politician

प्रतिनिधि– नुमाइंदे ,प्रवक्ता, ‘ Representative, delegate, spokesman

व्याख्या – लेखक कहता है कि बडे़-बडे़ देशी-विदेशी राजपुरुष, राजनीतिज्ञ, देश-विदेश के सबसे आगे रहने वाले समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि, अंतरष्ट्रीय संगठनों के संचालक, पादरी, ग्रंथकार आदि गांधीजी से मिलने के लिए आते थे। ये लोग खुद या इनके साथी-संगी भी गांधीजी के साथ बातचीत को ‘शॅार्टहैंड’ में लिखा करते थे। क्योंकि पूरी की पूरी बातचीत को हु-ब-हु लिखना हर किसी के बस की बात नहीं।जबकि महादेव एक कोने में बैठे-बैठे अपनी लम्बी लिखावट में सारी चर्चा को लिखते रहते थे। जब वे अपने स्थान पर पहुँच कर उस शॅार्टहैंड को वापस मूल रूप में लिखते तो भले ही वे गलतियाँ कर दें पर महादेव के काम में गलतियों की संभावना न थी। उनका कार्य निपुण होता था उसमें भूल का कोई स्थान नहीं होता था।

गद्यांश 13 – गांधीजी कहते: महादेव के लिखे ‘नोट’ के साथ थोड़ा मिलान कर लेना था न। और लोग दाँतों अँगुली दबाकर रह जाते।
लुई फिशर और गुंथर के समान धुरंधर लेखक अपनी टिप्पणियों का मिलान महादेव की टिप्पणियों के साथ करके उन्हें सुधारे बिना गांधीजी के पास ले जाने में हिचकिचाते थे।

शब्दार्थ
मिलान match

हिचकिचाते– संकोच, झिझकते Hesitate

दाँतों अँगुली दबाना (मुहावरा)- आश्चर्य चकित होना।

व्याख्या – गांधीजी हमेशा मुलाकात के लिए आए हुए लोगों से महादेव के लिखे ‘नोट’ के साथ थोड़ा मिलान कर लेने को कहते। गाँधी जी के महादेव भाई पर अटूट विश्वास को देखकर लोग दंग रह जाते थे।
लुई फिशर और गुंथर के समान अपने क्षेत्र के जाने माने लेखक भी अपनी टिप्पणियों का मिलान पहले महादेव की टिप्पणियों के साथ करके उन्हें सुधार लेते थे उसके बाद ही गांधीजी के पास ले जाते थे।अर्थात बिना मिलान किए सीधे गाँधी जी से अपने लेख अनुमोदन के लिए ले जाने में संकोच करते थे।

गद्यांश 14–साहित्यिक पुस्तकों की तरह ही महादेव वर्तमान राजनीति के इन प्रवाहों और घटनाओं से संबंधित अद्यतन जानकारी वाली पुस्तके भी पढ़ते रहते थे। हिंदुस्तान से संबंधित देश-विदेश की ताज़ी-से-ताज़ी राजनीतिक गतिविधियों और चर्चाओं की नयी-से-नयी जानकारी उनके पास मिल सकती थी। सभाओं में, कमेटियों की बैठकों में या दौड़ती रेलगाड़ियों के डिब्बों में ऊपर की बर्थ पर बैठकर, ठूँस-ठूँसकर भरे अपने बडे़-बडे़ झोलों में रखे ताज़े-से-ताज़े समाचार-पत्र, मासिक-पत्र और पुस्तके वे पढ़ते रहते, अथवा ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के लिए लेख लिखते रहते। लगातार चलने वाली यात्राओं, हर स्टेशन पर दर्शनों के लिए इकट्ठा हुई जनता के विशाल समुदायों, सभाओं, मुलाकातों, बैठकों, चर्चाओं और बातचीतों के बीच वे स्वयं कब खाते, कब नहाते, कब सोते या कब अपनी हाज़तें रफ़ा करते, किसी को इसका कोई पता नहीं चल पाता। वे एक घंटे में चार घंटों के काम निपटा देते। काम में रात और दिन के बीच कोई फर्क शायद ही कभी रहता हो। वे सूत भी बहुत सुंदर कातते थे। अपनी इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी वे कातना कभी चूकते नहीं थे।

शब्दार्थ

व्याख्या – लेखक स्वामी आनंद के अनुसार महादेव भाई साहित्यिक पुस्तकों को तो पढ़ते ही थे साथ ही महादेव उस समय की राजनीतिक प्रवाहों और घटनाओं से संबंधित ताज़ा जानकारी वाली पुस्तके भी पढ़ते रहते थे।हिंदुस्तान से संबंधित देश-विदेश की ताज़ी-से-ताज़ी राजनीतिक गतिविधियों और चर्चाओं की नयी-से-नयी जानकारी उनके पास मिल सकती थी। लेखक के अनुसार या तो महादेव सभाओं में, कमेटियों की बैठकों में या यात्राओं के दौरान चलती हुई रेलगाड़ियों के डिब्बों में ऊपर की बर्थ पर बैठकर, ठूँस-ठूँसकर भरे अपने बडे़-बडे़ झोलों में रखे ताज़े-से-ताज़े समाचार-पत्र, मासिक-पत्र और पुस्तके पढ़ते रहते थे या फ़िर ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के लिए लेख लिखते रहते। लगातार चलने वाली यात्राओं, हर स्टेशन पर दर्शनों के लिए इकट्ठा हुई जनता के विशाल समुदायों, सभाओं, मुलाकातों, बैठकों, चर्चाओं और बातचीतों के बीच वे स्वयं कब अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करते, किसी को इसका कोई पता भी नहीं चल पाता।
महादेव की एक ख़ास बात यह थी कि वे इतना तेज काम करते थे कि एक घंटे में चार घंटों के काम निपटा देते थे। काम करते वक्त रात और दिन का कोई फर्क वे नहीं समझते थे। उनकी एक विशेषता यह थी कि वे सूत भी बहुत सुंदर कातते थे। अपनी इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी वे कातना कभी नहीं भूलते थे। सूत कातने के लिए वे समय निकाल ही लेते थे।

गद्यांश 15- – बिहार और उत्तर प्रदेश के हजारों मील लंबे मैदान गंगा, यमुना और दूसरी नदियों के परम उपकारी, सोने की कीमत वाले ‘गाद’ के बने हैं। आप सौ-सौ कोस चल लीजिए रास्ते में सुपारी फोड़ने लायक एक पत्थर भी कहीं मिलेगा नहीं। इसी तरह महादेव के संपर्क में आने वाले किसी को भी ठेस या ठोकर की बात तो दूर रही, खुरदरी मिट्टी या कंकरी भी कभी चुभती नहीं थी। उनकी निर्मल प्रतिभा उनके संपर्क में आने वाले व्यक्ति को चंद्र-शुक्र की प्रभा के साथ दूधों नहला देती थी। उसमें सराबोर होने वाले के मन से उनकी इस मोहिनी का नशा कई-कई दिन तक उतरता न था।

शब्दार्थ

गाद – गाढ़ी चीज़, कीचड़, नदी द्वारा लाई गई गाढ़ी मिट्टी जो नीचे जम जाती है।

सराबोर – डूबा हुआ

खुरदरी मिट्टी-rough soil

व्याख्या – लेखक कहता है कि जिस तरह बिहार और उत्तर प्रदेश के हजारों मील लंबे मैदान गंगा, यमुना और दूसरी नदियों के परम उपकारी, सोने की कीमत वाले कीचड़ के बने हैं। यदि कोई इन मैदानों के किनारे सौ-सौ कोस भी चल लेगा तो भी रास्ते में सुपारी फोड़ने लायक एक पत्थर भी कहीं नहीं मिलेगा।
इसी तरह महादेव के संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति को ठेस या ठोकर की बात तो दूर रही, कभी मन को चुभती बात कहना भी संभव न था यह उनके कोमल स्वभाव का ही परिणाम था। लेखक कहता है कि महादेव जी के स्वभाव के कारण उनसे मिलने वाले व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे।
लेखक कहता है कि उनके स्वाभाव प्रभावित हुए व्यक्ति कई दिनों तक उनके बारे में ही बातें करते रहते थे। उनके व्यक्तित्व के संपर्क में आने वाले उनसे उसी तरह प्रभावित रहते जैसे चंद्र-शुक्र की प्रभा की दूधिया रोशनी से भीग गया हो।

गद्यांश 16-महादेव का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधीजी के साथ एकरूप होकर इस तरह गुँथ गए थे कि गांधीजी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना की ही नहीं जा सकती थी।कामकाज की अनवरत व्यस्तताओं के बीच कोई कल्पना भी न कर सके, इस तरह समय निकालकर लिखी गई दिन-प्रतिदिन की उनकी डायरी की वे अनगिनत अभ्यास पुस्तके, आज भी मौजूद हैं।

शब्दार्थ

गाद – गाढ़ी चीज़, कीचड़
सराबोर – डूबा हुआ
अनवरत – लगातार
अनगिनत – जिसे गिना न जा सके

व्याख्या – लेखक ने महादेव भाई के मधुर स्वभाव की तुलना बिहार और उत्तरप्रदेश की परोपकारी, सोने की कीमत वाली उपजाऊ मिट्टी से की है जिसमें यदि कोई इन मैदानों के किनारे सौ-सौ कोस भी चल लेगा तो भी रास्ते में सुपारी फोड़ने लायक एक पत्थर भी कहीं नहीं मिलेगा।उन्होंने बताया है कि जिस तरह नदियों द्वारा लाई इस उपजाऊ मिट्टी में जरा भी कंकड़-पत्थर नहीं मिलते उसी प्रकार महादेव भाई के व्यवहार में भी सिर्फ़ मिठास ही थी जरा भी कठोरता न थी। इसी कारण महादेव के संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति को ठेस या ठोकर की बात तो दूर रही, खुरदरी मिट्टी या कंकरी भी कभी नहीं चुभती थी, यह उनके कोमल स्वभाव का ही परिणाम था। लेखक कहता है कि महादेव जी के स्वभाव के कारण उनसे मिलने वाले व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे।
लेखक कहता है कि उनके स्वाभाव प्रभावित हुए व्यक्ति कई दिनों तक उनके बारे में ही बातें करते रहते थे। महादेव का पूरा जीवन और उनके सारे कामकाज गांधीजी के साथ इस तरह से मिल गए थे कि गांधीजी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती थी।
महादेव और गांधीजी इस तरह हो गए थे जैसे सिक्के के दो पहलु। कामकाज की लगातार व्यस्त रहते हुए भी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, कि वे किस तरह समय निकालकर वे अपनी डायरी लिखते थे। दिन-प्रतिदिन की उनकी डायरी की वे अनगिनत अभ्यास पुस्तके आज भी मौजूद हैं।

गद्यांश 17– प्रथम श्रेणी की शिष्ट, संस्कार-संपन्न भाषा और मनोहारी लेखनशैली की ईश्वरीय देन महादेव को मिली थी। यद्यपि गांधीजी के पास पहुँचने के बाद घमासान लड़ाइयों, आंदोलनों और समाचार-पत्रों की चर्चाओं के भीड़-भरे प्रसंगों के बीच केवल साहित्यिक गतिविधियों के लिए उन्हें कभी समय नहीं मिला, फिर भी गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद उन्होंने किया, जो ‘नवजीवन’ में प्रकाशित होनेवाले मूल गुजराती की तरह हर हफ़्ते‍ ‘यंग इंडिया’ में छपता रहा। बाद में पुस्तक के रूप में उसके अनगिनत संस्करण सारी दुनिया के देशों में प्रकाशित हुए और बिके।

शब्दार्थ:

शिष्ट-विनीत, elegant

लेखनशैली– लिखने का तरीका , writing style,

साहित्यिक गतिविधियों – literary activities,

घमासान -भीषण, गहरा।

व्याख्या लेखक कहता है कि अव्वल दर्ज़े की विनीत , संस्कार- संपन्न भाषा और मन को लुभाने वाली लेखनशैली महादेव को मुख्य रूप से भगवान की ही कृपा से मिली थी। यद्यपि गांधीजी के पास पहुँचने के बाद घमासान लड़ाइयों, आंदोलनों और समाचार-पत्रों की चर्चाओं के भीड़-भरे प्रसंगों के बीच केवल साहित्यिक गतिविधियों के लिए उन्हें कभी समय नहीं मिला, फिर भी गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद उन्होंने किया, जो ‘नवजीवन’ में प्रकाशित होने वाले मूल गुजराती की तरह हर हफ्ते ‘यंग इंडिया’ में छपता रहा। लेखक कहता है कि लेख की तरह छपने के बाद, पुस्तक के रूप में उसके अनगिनत संस्करण सारी दुनिया के देशों में प्रकाशित हुए और बिके।

गद्यांश 18 – सन् 1934-35 में गांधीजी वर्धा के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद अचानक मगनवाड़ी से चलकर सेवागाँव की सरहद पर एक पेड़ के नीचे जा बैठे। उसके बाद वहाँ एक-दो झोंपड़े बने और फिर धीरे-धीरे मकान बनकर तैयार हुए, तब तक महादेव भाई दुर्गा बहन और चि. नारायण के साथ मगनवाड़ी में रहे। वहीं से वे वर्धा की असह्य गरमी में रोज़ सुबह पैदल चलकर सेवाग्राम पहुँचते थे। वहाँ दिनभर काम करके शाम को वापस पैदल आते थे। जाते-आते पूरे 11 मील चलते थे। रोज़-रोज़ का यह सिलसिला लंबे समय तक चला। कुल मिलाकर इसका जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, उनकी अकाल मृत्यु के कारणों में वह एक कारण माना जा सकता है।

शब्दार्थ
असह्य – सहन न की जाने वाली
सिलसिला – क्रम
अनायास – अचानक

व्याख्या – लेखक कहता है कि सन् 1934-35 में गांधीजी वर्धा के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद अचानक मगनवाड़ी से चलकर सेवागाँव की सीमा पर लगे एक पेड़ के नीचे जा बैठे। उसके बाद वहाँ एक-दो झोंपड़े बने और फिर धीरे-धीरे मकान बनकर तैयार हुए, जब तक यह काम हो रहा था तब तक महादेव भाई, उनकी पत्नी दुर्गा बहन और पुत्र चि. नारायण मगनवाड़ी में ही रहे। वहीं से वे वर्धा की अत्यधिक गर्मी में रोज़ सुबह पैदल चलकर सेवाग्राम पहुँचते थे। वहाँ दिनभर काम करके शाम को वापस पैदल आते थे। वे हर रोज जाते-आते पूरे 11 मील चलते थे। रोज़-रोज़का यह क्रम लंबे समय तक चला। लेखक का मानना है कि इसका महादेव भाई के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। उनकी असमय मृत्यु के कारणों में वह एक कारण माना जा सकता है।

गद्यांश 19–इस मौत का घाव गांधीजी के दिल में उनके जीते जी बना ही रहा। वे भर्तृहरि के भजन की यह पंक्ति हमेशा दोहराते रहे:
‘ए रे जखम जोगे नहि जशे’- यह घाव कभी योग से भरेगा नहीं।
बाद के सालों में प्यारेलाल जी से कुछ कहना होता, और गांधीजी उनको बुलाते तो उस समय भी अनायास उनके मुँह से ‘महादेव’ ही निकलता।

शब्दार्थ-

भर्तृहरि -एक राजा जो बाद में महान संन्यासी बने।

व्याख्या- लेखक के अनुसार महादेव की मौत का घाव गांधीजी के दिल में हमेशा बना ही रहा। वे भर्तृहरि के भजन की यह पंक्ति हमेशा दोहराते रहे: ‘ए रे जखम जोगे नहि जशे’- यह घाव कभी योग से भरेगा नहीं।” बहुत सालों के बाद भी जब गांधीजी अपने अन्य निजी सचिव प्यारेलालजी से कुछ कहना चाहते, और उनको बुलाते तो उस समय भी अनायास ही उनके मुँह से महादेव का नाम निकलता।

  1. महादेव भाई की तुलना शूक्रतारे से की गई है क्योंकि जिस प्रकार शुक्रतारा बहुत कम समय के लिए दिखाई देता है और अपने प्रकाश, सुंदरता और स्थिति से सबको प्रभावित कर अस्त हो जाता है उसी प्रकार महादेव भाई देसाई भी कम आयु तक ही इस धरा धाम में रहे और अपनी योग्यता, कार्य-कुशलता और मधुर स्वभाव से सबको प्रभावित कर अल्प-आयु में ही चले गए।
  2. महादेव भाई स्वयं को गाँधी जी का”हम्माल’ और ’पीर-बावर्ची- भीश्ती-खर’ कहकर परिचय देने में गर्व का अनुभव करते थे।
  3. महादेव भाई की1917 में महात्मा गाँधी के पास गए थे और गाँधी जी के निजी सचिव बने थे।
  4. सन् 1919 में गाँधीजी ने महादेव भाई को अपना वारिस कहा था जब जलियाँवाला बाग काँड के विरोध में पंजाब जाते हुए गाँधी जी को पलवल स्टेशन पर गिरफ़्तार कर लिया गया था।
  5. सन् 1929 तक महादेव भाई पूरे देश के दुलारे बन गए थे।
  6. इसी दौरान ब्रिटिश फ़ौजी शासन के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और राष्ट्रवादीलोगों पर अत्याचार किया गया और उन्हें पकड़कर कालापानी बेज दिया गया जिनमें ट्रिब्यून के संपादक कालीनाथ भी थे।
  7. ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को बताने लोग गाँधी जी के पास मणिभवन में आते थे। महादेव उनका संक्षिप्त ब्यौरा तैयार करते थे और उन्हें गाँधी जी से मिलवाते थे।
  8. ” क्रानिकल” समाचार पत्र के अंग्रेज संपादक हार्निमैन को निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। जिसके बाद संपादक के अभाव में ” क्रानिकल” गाँधी जी के पास आ गया। इसके कुछ दिनों बाद एक और समाचार पत्र ’ यंग इंडिया” जिसे बम्बई के तीन व्यवसाई शंकर लाल बैंकर, उम्मर सोबानी और जमनादास द्वारकादास निकालते थे क्योंकि इसमें भी मुख्य रूप से संपादक हार्निमैन ही लिखते थे।
  9. इन दोनों के अतिरिक्त एक और समाचार पत्र ’नवजीवन ’ भी गाँधी जी के पास आ गया। इन सबका संपादन और आय-व्यय की जिम्मेदारी लेखक और महादेव भाई संहालते थे।
  10. गाँधीजी के साथ यात्रा करते हुए भी व्यस्ततम समय के दौरान महादेव भाई इन पत्रों के लिए लेख लिखना न भूलते थे।
  11. गाँधीजी पर प्रतिक्रिया करने वाले देशी-विदेशी आलोचकों पत्रकारों को भी महादेव भा बड़ी ही सभ्य भाषा में उत्तर देते थे। उनकी सुसभ्य भाषा के प्रभाव से विरोधी भी उनके कायल हो जाते थे
  12. महादेव भाई साहित्य के प्रति भी रुचि रखते थे। उन्होंने अपने जिगरी दोस्त के साथ मिलकर प्रसिद्ध लेखक रवींद्र नाथ ठाकुर और शरदचंद्र के उपन्यासों का अनुवाद किया था। किंतु आगे अपनी व्यस्तता के कारण वे कुछ और कार्य न कर सके हालांखि उन्होंने गाँधी जी के आत्मकथाअ”सत्य ’ के प्रयोग ’ का गुजराती से अंग्र्जी अनुवाद किया था।
  13. उनका लेख बहुत ही सुंदर था।
  14. वे बहुत तेज़ी से लिखते थे। उन्हें शॉर्टहैंड नहीं आती थी। वे गाँधी जी के सभी भा्षण , मीटिंग,सब कुछ पूरा -पूरा लिखते थे।
  15. महादेव भाई लिखते वक्त गलतियाँ नहीं करते थे। बड़े-बड़े धुरंधर लेखक भी गाँधी जी के पास अपने लेख ओके करवाने से पहले महादेव भाई से मिलान करते थे।
  16. अपनी यात्राओं क्र दौरान भी वे लेख लिखते, नए समाचारों की जानकारी प्राप्त करते और गाँधी जी के चर्चाओं और भाषणों का ब्यौरा रखते थे।
  17. वे सभी काम बहुत तेज़ी से करते थे।
  18. उनका व्यवहार बहुत मधुर था। उनसे मिलने वाले लोग उनके मधुर व्यवहार के कारण उनसे प्रभावित हुए बिना न रह पाते थे।
  19. गाँधी जी से उनका व्यक्तित्व इस तरह जुड़ गया था कि उनसे अलग उनकी कल्पना करना संभव नहीं है।
  20. अपनी अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद वे अपनी डयरी लिखना न भूलते थे।
  21. 1934-35 में वे गाँधी जी के साथ वर्धा के महिला आश्रम और मगनवाड़ी में रहने लगे। यहाँ से गर्मी में चलकर प्रतिदिन सेवाग्राम जाते और आते थे। बहुत गर्मी में वे लगभग 11 मील रोज चलते थे।
  22. महादेव भाई इस असह्य गर्मी को सहन न कर पाए और बीमार हो गए । बाद में यही उनके मृत्यु का कारण बना।
  23. गाँधी जी अकसर उनको याद करते हुए कहते थे- ‘ए रे जखम जोगे नहि जशे’

प्रश्न 1.महादेव भाई अपना परिचय किस रूप में देते थे?

उत्तर: महादेव भाई स्वयं को गाँधी जी का ’हम्माल’ कहकर अथवा कभी-कभी ’पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ कहकर अपना परिचय देते थे।

प्रश्न 2. ’यंग इंडिया’ साप्ताहिक में लेखों की कमी क्यों रहने लगी?

उत्तर: ’यंग इंडिया’ साप्ताहिक में अधिकाँश लेख “क्रानिकल” के अंग्रेज संपादक हार्निमैन लिखते थे। उनको देश-निकाला देकर वापस इंग्लैंड भेज देने से लेखों की कमी रहने लगी।

प्रश्न 3.गाँधीजी ने ’यंग इंडिया’ प्रकाशित करने के विषय में क्या निश्चय किया?

उत्तर: गांधीजी का काम इतना बढ़ गया कि समाचार पत्र और साप्ताहिक पत्र भी कम पड़ने लगा। इसी कारण गाँधीजी ने ’यंग इंडिया’ को सप्ताह में दो बार प्रकाशित करने के विषय में क्या निश्चय किया।

प्रश्न 4. गाँधीजी से मिलने से पहले महादेव भाई कहाँ नौकरी करते थे?

उत्तर:गांधीजी के पास आने के पहले महादेव भाई ने सरकार के अनुवाद-विभाग में नौकरी की थी।

प्रश्न 5. महादेव भाई के झोलों में क्या भरा रहता था?

उत्तर: महादेव भाई के झोलों में ताज़े समाचार पत्र, मासिक-पत्र और पुस्तकें भरी रहती थी।

प्रश्न 6.महादेव भाई ने गाँधीजी की कौन-सी प्रसिद्ध पुस्तक का अनुवाद किया था?

उत्तर: महादेव भाई ने गाँधी जी की प्रसिद्ध पुस्तक उनकी आत्मकथा “सत्य की खोज” का गुजराती से अंग्रेजी अनुवाद किया था।

प्रश्न 7. अहमदाबाद से कौन-से दो साप्ताहिक निकलते थे?

उत्तर: अहमदाबाद से ’यंग इंडिया’ और ’नवजीवन’ नाम के दो साप्ताहिक निकलते थे।

प्रश्न 8. महादेव भाई दिन में कितनी देर काम करते थे?

उत्तर: महादेव भाई लगातार चलने वाली यात्राओं, मुलाकातों, चर्चाओं और गाँधीजी के कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण लगभग 18-20 घंटे तक काम करते थे।

प्रश्न 9.महादेव भाई से गांधी जी की निकटता किस वाक्य से सिद्ध होती है?


उत्तर- महादेव भाई से गाँधी जी की निकटता इस बात से सिद्ध होती है कि उनकी मृत्यु के बाद के सालों में प्यारेलाल को बुलाते हुए वे ‘महादेव’ पुकार बैठते थे।

लिखित

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 – गांधी जी ने महादेव को अपना वारिस कब कहा था?

उत्तर – सन् 1917 में जब महादेव भाई गांधी के पास पहुँचे। तभी गांधी जी ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें उत्तराधिकारी का पद सौंपा था। 1919 में जलियाँबाग कांड के समय पंजाब जाते समय गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया। उसी समयउन्होंने महादेव भाई को अपना वारिस कहा था।

प्रश्न 2 – गांधी जी से मिलने आनेवालों के लिए महादेव भाई क्या करते थे?

उत्तर – महादेव भाई पहले लोगों से उनकी समस्याएँ सुनते थे। उनकी संक्षिप्त टिप्पणी तैयार करके गाँधी जी के सामने पेश करते थे तथा लोगों की मुलाकात गाँधी जी से करवाते थे।

प्रश्न 3 – महादेव भाई की साहित्यिक देन क्या है?

उत्तर – महादेव भाई ने‘चित्रांगदा’,’कच-देवयानी की कथा ” पर रचित टैगोर का उपन्यास ‘विदाई का अभिशाप’ शीर्षक नाटिका,  ‘शरद बाबू की कहानियाँ’ आदि का अनुवाद किया था तथा गांधी जी की गतिविधियों पर टीका-टिप्पणी के अलावा उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेजी अनुवाद महादेव भाई की साहित्यिक देन है।

प्रश्न 4 – महादेवभाई की अकाल मृत्यु को कारण क्या था?

उत्तर – सन् 1934-35 में गांधीजी वर्धा के महिला आश्रम में और मगनवाड़ी में रहने के बाद सेवागाँव की सरहद पर पेड़ के नीचे रहने चले गए। वहाँ मकान बनने तक महादेव भाई दुर्गा बहन और चि. नारायण के साथ मगनवाड़ी में रहे। वहीं से वे वर्धा की असह्य गरमी में रोज़ सुबह पैदल चलकर सेवाग्राम पहुँचते थे। वहाँ दिनभर काम करके शाम को वापस पैदल आते थे। जाते-आते पूरे 11 मील चलते थे। रोज़-रोज़ का यह सिलसिला लंबे समय तक चला। कुल मिलाकर इसका जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, उनकी अकाल मृत्यु के कारणों में वह एक कारण माना जा सकता है।

प्रश्न 5 – महादेव भाई के लिखे नोट के विषय में गांधी जी क्या कहते थे?

उत्तर – महादेव भाई के द्वारा लिखित नोट बहुत ही सुंदर और इतने शुद्ध होते थे कि उनमें कॉमा और मात्रा की भूल और छोटी गलती भी नहीं होती थी। गांधी जी दूसरों से कहते कि अपने नोट महादेव भाई के लिखे नोट से ज़रूर मिला लेना।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-

प्रश्न 1 – पंजाब में फ़ौजी शासन ने क्या कहर बरसाया?

उत्तर – पंजाब में फ़ौजी शासन ने काफी कहर बरसाया था पंजाब के अधिकतर नेताओं को गिरफ्तार करके फ़ौजी-शाशन के तहत आजन्म कैद की सज़ा दे कर काला पानी भेज दिया गया। 1919 में जलियाँवाला बाग में सैकड़ों निर्दोष लोगों को गोलियों से भून दिया गया। प्रेस की स्वतंत्रता को रोकने के लिए लाहौर के मुख्यअंग्रेज़ी समाचार पत्र ‘ट्रिब्यून’ के संपादक श्री कालीनाथ राय को 10 साल की जेल की सज़ा दी गई।

प्रश्न 2 – महादेव जी के किन गुणों ने उन्हें सबका लाडला बना दिया था?

उत्तर – महादेव भाई बड़े शिष्ट व्यवहार वाले व्यक्ति थे। जब देश-विदेश के समाचार पत्र गाँधीजी की गतिविधियों को देखकर उनमें टीका-टिप्पड़ीं करते तो महादेव भाई उनको आड़े हाथों लेते। लेकिन आलोचकों और अपने कट्टर विरोधियों को उत्तर देते समय भी महादेव भाई अपनी शिष्ट-संयमित भाषा शैली में ही उत्तर देते। वे पत्रों का जवाब जितनी शिष्टता से देते थे, उतनी ही विनम्रता से लोगों से मिलते थे। वे विरोधियों के साथ भी उदार व्यवहार करते थे। उनके इन्हीं गुणों ने उन्हें सभी का लाडला बना दिया।

प्रश्न 3 – महादेव जी की लिखावट की क्या विशेषताएँ थीं?

उत्तर –महादेव भाई का लेख अत्यंत सुंदर था। उस समय उनके से लिखावट का भारत में कोई सानी नहीं था। वे जेट की सी तेज़ गति से लंबे व्याख्यान लिख सकते थे। उनकी लिखावट में कोई भी गलती नहीं होती थी। महादेव जी की लिखावट बहुत सुंदर, स्पष्ट थी। तेज़ लिखते भी उसमें मात्रा और कॉमा की भी अशुधि नहीं होती थी। लोग शॉर्ट हैंड लिखे हुए को सही लिखकर वापस गाँधी जी से ओके कराने आते तो गाँधी जी उन्हें महादेव के साथ मिलान करने को कहते थे। उनके सुंदर लेख में लिखे पत्रों को देख कर वायसराय को भी इस बात का अफ़सोस होता कि पूरे भारत का वायसराय होने पर भी उसके पास गाँधी जी जैसा खुशनवीश नहीं था।

(ग) निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

प्रश्न 1 – ‘अपना परिचय उनके ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में देने में वे गौरवान्वित महसूस करते थे।’

आशय- महादेव भाई गांधी जी के निजी सचिव और निकटतम सहयोगी थे। वे गाँधी जी के लिए सब कुछ करने को तैयार रहते थे। वे गांधी जी की प्रत्येक गतिविधि, उनके भोजन और दैनिक कार्यों में साथ देते थे। इसके अतिरिक्त वे गाँधी जी स्वयं को गांधी का सलाहकार, उनका रसोइया, मसक से पानी ढोने वाला तथा लगातार काम करने के कारण गधे मानते थे। स्वयं को गाँधी जी का ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ कहते हुए वे गर्व का अनुभव करते थे।

प्रश्न 2 – इस पेशे में आमतौर पर स्याह को सफेद और सफ़द को स्याह करना होता था।

उत्तर – महादेव ने गाँधी जी के सान्निध्य में आने से पहले वकालत का काम किया था। इस काम में वकीलों को अपना केस जीतने के लिए सच को झूठ और झूठे को सच बताना पड़ता है। इसलिए कहा गया है कि इस पेशे में स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह करना होता था।

प्रश्न 3 – देश और दुनिया को मुग्ध करके शुक्रतारे की तरह ही अचानक अस्त हो गए।

आशय- महादेव भाई की तुलना शुक्रतारे से की गई है क्योंकि जिस प्रकार शुक्रतारा बहुत कम समय के लिए दिखाई देता है और अपने प्रकाश, सुंदरता और स्थिति से सबको प्रभावित कर शीघ्र ही अस्त हो जाता है उसी प्रकार महादेव भाई देसाई भी कम आयु तक ही इस धरा धाम में रहे और अपनी योग्यता, कार्य-कुशलता और मधुर स्वभाव से सबको प्रभावित कर अल्प-आयु में ही चले गए।

प्रश्न 4 – उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय लंबी साँस-उसाँस लेते रहते थे।

उत्तर – महादेव इतनी शुद्ध और सुंदर लेख में पत्र लिखते थे कि देखने वालों मंत्रमुग्ध रह जाते थे। गाँधी जी के पत्रों का लेखन महादेव भाई ही करते थे। वे पत्र जब दिल्ली और शिमला में बैठे वाइसराय देखते थे तो गहरी साँसें ले कर रह जाते थे क्योंकि ब्रिटिश सल्तनत के वायसराय को भी गाँधी जी जैसा सुन्दर लिखने वाला खुशनवीस नहीं मिलता था।

शुक्रतारे के समान पाठ का भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्दों का निर्माण कीजिए-

  1. सप्ताह – साप्ताहिक
  2. अर्थ – ………..
  3. साहित्य – ………..
  4. धर्म – ………..
  5. व्यक्ति – ………….
  6. मास – ……….
  7. राजनीति – …………
  8. वर्ष – ……….

उत्तर-

  1. सप्ताह – साप्ताहिक
  2. अर्थ – आर्थिक
  3. साहित्य – साहित्यिक
  4. धर्म – धार्मिक
  5. व्यक्ति – वैयक्तिक
  6. मास – मासिक
  7. राजनीति – राजनैतिक
  8. वर्ष – वार्षिक

प्रश्न 2.नीचे दिए गए उपसर्गों का उपयुक्त प्रयोग करते हुए शब्द बनाइए-

अ, नि, अन, दुर, वि, कु, पर, सु, अधि

उत्तर-

  • आर्य – अन + आर्य = अनार्य
  • आगत – सु + आगत = स्वागत
  • डर – नि + डर = निडर
  • आकर्षक – अन + आकर्षक = अनाकर्षक
  • क्रय – वि + क्रय = विक्रय
  • मार्ग – कु + मार्ग = कुमार्ग
  • उपस्थित – अन + उपस्थित = अनुपस्थित
  • लोक – पर + लोक = परलोक
  • नायक – वि + नायक = विनायक
  • भाग्य – दुर + भाग्य = दुर्भाग्य

प्रश्न 3.निम्नलिखित मुहावरों को अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-

आड़े हाथों लेना, दाँतों तले अंगुली दबाना, लोहे के चने चबाना, अस्त हो जाना, मंत्रमुग्ध करना।
उत्तर- मुहावरे – वाक्य प्रयोग
आड़े हाथों लेना – देर से स्कूल आने पर अप्रधानाचार्या ने छात्र को आड़े हाथों लिया।
दाँतों तले अँगुली दबाना –भारत की सेना का रण कौशल देख दुश्मनों ने दाँतों तले अँगुली दबा ली।
लोहे के चने चबाना – आजकल सरकारी नौकरी पाने के लिए लोहे के चने चबाने पडते है
अस्त हो जाना –असहनीय गर्मी के कारण अस्वस्थ होकर महादेव भाई जैसी प्रतिभा का सूरज अल्पायु मे ही अस्त हो गया।
मंत्रमुग्ध करना – गायिका की मधुर आवाज सभा में मौजूद हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर रही है।

प्रश्न 4.निम्नलिखित शब्दों के पर्याय लिखिए-

  1. वारिस – ………..
  2. जिगरी – ………………
  3. कहर – ……………..
  4. मुकाम – ………….
  5. रूबरू – ………….
  6. फ़र्क – …………
  7. तालीम – …………….
  8. गिरफ्तार – ……………..

उत्तर

  1. वारिस – उत्तराधिकारी, दायभागी।
  2. जिगरी – घनिष्ठ, पक्का
  3. कहर – मुसीबत,आपदा
  4. मुकाम – मंजिल,लक्ष्य
  5. रूबरू – आमने-सामने
  6. फ़र्क – अंतर,भिन्नता
  7. तालीम – शिक्षा
  8. गिरफ्तार – बंधक, कैद, बंदी

प्रश्न 5.उदाहरण के अनुसार वाक्य बदलिए-

उदाहरण : गांधी जी ने महादेव भाई को अपना वारिस कहा था।
गांधी जी महादेव भाई को अपना वारिस कहा करते थे।

  1. महादेव भाई अपना परिचय ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में देते थे।
  2. पीड़ितों के दल-के-दल गामदेवी के मणिभवन पर उमड़ते रहते थे।
  3. दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकलते थे।
  4. देश-विदेश के समाचार-पत्र गांधी जी की गतिविधियों पर टीका-टिप्पणी करते थे।
  5. गांधी जी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे।

उत्तर-

  1. महादेव भाई अपना परिचय पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ के रूप में दिया करते थे।
  2. पीड़ितों के दल-के-दल गामदेवी के भवन पर उमड़ा करते थे।
  3. दोनों साप्ताहिक अहमदाबाद से निकला करते थे।
  4. देश-विदेश के समाचार-पत्र गांधी जी की गतिविधियों पर टीका-टिप्पणी किया करते थे।
  5. गांधी जी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाया करते थे

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